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दुर्गा पूजा का बदला सियासी रंग (Img: AI Generated Image)
Kolkata: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ आस्था और संस्कृति का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और राजनीतिक प्रभाव का भी बड़ा मंच रही है। कोलकाता के भव्य पंडालों से लेकर स्थानीय पूजा समितियों तक, इस उत्सव में नेताओं की भूमिका लंबे समय से चर्चा में रही है। सत्ता में बदलाव के बाद पूजा समितियों से जुड़े कई राजनीतिक चेहरे बदलने की बात सामने आई है।
कोलकाता के लेक टाउन इलाके में श्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब का दुर्गा पूजा पंडाल इस बार खास आकर्षण बना हुआ है। यहां जयपुर के हवा महल की करीब 80 फुट ऊंची प्रतिकृति तैयार की गई है, जिसे गुलाबी रंग में सजाया गया है। पूजा समिति के कार्यकारी अध्यक्ष प्रबीर धर को उम्मीद है कि इस बार पिछले साल के मुकाबले अधिक श्रद्धालु पहुंचेंगे। पिछले वर्ष इस पंडाल में करीब डेढ़ करोड़ लोगों के आने का अनुमान लगाया गया था।
लेकिन इस पंडाल की चर्चा सिर्फ इसकी भव्यता तक सीमित नहीं है। पहले यह आयोजन तृणमूल कांग्रेस के नेता सुजीत बोस से जुड़ा था। इस बार आयोजन की जिम्मेदारी नई समिति के हाथों में है। समिति का कहना है कि उत्सव की भव्यता बनाए रखते हुए स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाने और आसपास के निवासियों को होने वाली परेशानियां कम करने पर ध्यान दिया जाएगा।
इस बार श्रीभूमि में महालया के अगले दिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने पूजा का उद्घाटन किया। इससे पहले महालया के दिन ही पंडाल खोलने की परंपरा रही थी। प्रबीर धर ने पितृ पक्ष में पूजा शुरू करने पर आपत्ति जताते हुए इसे सनातन परंपरा से जुड़ा मुद्दा बताया। उनके मुताबिक, देवी की पूजा देवी पक्ष में होनी चाहिए। इस घटनाक्रम ने पूजा की तारीख और धार्मिक परंपराओं को लेकर बहस भी तेज कर दी।
कोलकाता की दूसरी प्रमुख पूजा समितियों में भी नेतृत्व में बदलाव देखने को मिला है।
सुरुचि संघ, न्यू अलीपुर: यहां भाजपा विधायक सौरभ सिकदर ने अरूप बिस्वास और उनके भाई स्वरूप से जुड़ी पुरानी व्यवस्था की जगह अहम भूमिका संभाली है।
हातीबागान सार्वजनिक दुर्गा पूजा: यहां भाजपा नेता और राज्य के उद्योग मंत्री तापस रॉय को जिम्मेदारी मिली है। इससे पहले पूजा से तृणमूल नेता अतीन घोष और उनके सहयोगी शाश्वत बोस जुड़े थे।
ताला प्रत्योय: यहां भी पूजा समिति के संरक्षक की भूमिका में बदलाव हुआ है और भाजपा विधायक ऋतेश तिवारी का नाम सामने आया है।
नई व्यवस्था से जुड़े नेताओं का कहना है कि पूजा किसी एक राजनीतिक नेता की पहचान बनने के बजाय स्थानीय लोगों का उत्सव होनी चाहिए। सुरुचि संघ के सौरभ सिकदर ने भी पूजा को न्यू अलीपुर के निवासियों से जोड़ने की बात कही है। हालांकि, असली सवाल यह है कि क्या नेतृत्व बदलने से आयोजन पर स्थानीय लोगों का नियंत्रण भी बढ़ेगा।
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के साथ राजनीति का जुड़ाव नया नहीं है। आजादी से पहले भी पूजा पंडालों का इस्तेमाल सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने के लिए किया जाता था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कुछ आयोजनों में देवी की प्रतिमा के पीछे भारत का नक्शा रखा जाता था। वर्ष 1926 में स्थापित शिमला व्यायाम समिति की पूजा में देवी को खादी के वस्त्र पहनाए जाने के कारण इसे ‘स्वदेशी ठाकुर’ कहा गया।
आजादी के बाद कांग्रेस से जुड़े नेताओं का कई पूजा समितियों में प्रभाव रहा। वर्ष 1977 में वाम मोर्चे की सरकार आने के बाद धार्मिक आयोजनों में राजनीतिक भागीदारी का तरीका अलग रहा। बाद में तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में पूजा समितियों से नेताओं का जुड़ाव और अधिक चर्चा में आया। कला इतिहासकार तापती गुहा ठाकुरता ने इस चलन को त्योहारों के जरिए प्रशासन और राजनीतिक संदेश पहुंचाने से जोड़कर देखा है।
इस बार बदलाव केवल पूजा समितियों के नेतृत्व तक सीमित नहीं है। पारंपरिक पूजा पद्धति और देवी की प्रतिमा के स्वरूप को लेकर भी चर्चा हो रही है। भाजपा विधायक सजल घोष का कहना है कि देवी की मूर्ति अपने पारंपरिक रूप में होनी चाहिए और कलात्मक प्रयोगों के नाम पर उसके मूल स्वरूप में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए।
मूर्तिकारों के अनुसार, कुछ पूजा समितियों ने प्रतिमा की ऊंचाई 11 फुट तक सीमित रखने की शर्त रखी है। उनका कहना है कि इस बार इन शर्तों का पालन कराने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। हालांकि, पूर्वी मेदिनीपुर के कांथी स्थित नंदनिक क्लब के मुख्य मूर्तिकार अनिर्बान दास ने कहा कि उनके यहां हर साल की तरह महिषासुरमर्दिनी की पूजा होगी और आयोजन पर किसी राजनीतिक दबाव की बात नहीं है।
दुर्गा पूजा से पहले पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन की बिक्री और सेवन पर रोक लगाने की मांग भी उठी है। इसके अलावा महाअष्टमी पर शराब की बिक्री और पूजा और विसर्जन जुलूसों में डीजे के इस्तेमाल को लेकर सरकार के निर्देश चर्चा में हैं।
राज्य सरकार ने इस साल पूजा समितियों के लिए कई व्यवस्थाओं की घोषणा की है। इनमें महाअष्टमी पर शराब की बिक्री पर रोक, डीजे पर प्रतिबंध और छोटे बजट वाली समितियों को एक लाख रुपये तक की सहायता शामिल है। इन फैसलों से पूजा के आयोजन के तरीके में बदलाव देखने को मिल सकता है।
पश्चिम बंगाल में सत्ता बदलने के बाद पूजा समितियों से जुड़े राजनीतिक चेहरे बदले हैं, लेकिन राजनीति और उत्सव का रिश्ता कितना बदलेगा, यह अभी साफ नहीं है। श्रीभूमि सहित कई समितियां स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाने की बात कर रही हैं। वहीं, भव्य पंडालों, सुरक्षा व्यवस्था और बढ़ते व्यवसायीकरण के कारण आम श्रद्धालुओं की भागीदारी को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं। इस बार की दुर्गा पूजा इसलिए भी अहम है, क्योंकि इसमें एक तरफ पुरानी परंपराओं को बनाए रखने की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ आयोजन को स्थानीय लोगों से दोबारा जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
Location : Kolkata
Published : 17 October 2026, 5:03 PM IST
Topics : Durga Puja 2026 Suvendu Adhikari West Bengal