The Candid Talk: गरीबों-अमीरों के लिए अलग कानून क्यों? कोर्ट में तारीख पर तारीख क्यों? ज्योतिका कालरा ने दिया सवालों के बेबाक जवाब

कानून एक ऐसा शब्द है, जिससे आम आदमी बेहद ज्यादा डरता है। यह भी कहा जा सकता है कि ताकतवर लोग उसी कानून से खेलते नजर आते हैं। सवाल सीधा है कि क्या भारत में कानून और न्याय सबके लिए एक बराबर हैं या फिर इंसाफ भी पहचान देखकर अपना रास्ता बदल देता है। आज कानून, न्याय और कोर्ट से जुड़े सभी सवालों के जवाब देंगी महिला अधिकार और मानव अधिकार की हर आवाज को बेबाक तरीके से उठाने वाली सीनियर लीगल एक्सपर्ट और पूर्व NHRC मेंबर ज्योतिका कालरा।

Post Published By: Mayank Tawer
Updated : 22 February 2026, 6:02 PM IST

New Delhi: डाइनमाइट न्यूज़ के पॉडकास्ट The Candid Talk में आज सीनियर लीगल एक्सपर्ट और पूर्व NHRC मेंबर ज्योतिका कालरा ने एडिटर-इन-चीफ मनोज टिबड़ेवाल आकाश के साथ खास बातचीत में उन सवालों के जवाब दिए, जिनको लेकर समाज में सबसे ज्यादा डर होता है। हम आज बात करेंगे कानून, न्याय और कोर्ट के बारे में। हर व्यक्ति की जिंदगी में एक बार ऐसा मोड़ जरूर आता है, जब कानून और न्याय के लिए व्यक्ति दर-दर की ठोकरें खाता है। इस खास बातचीत में हमारे साथ हैं ज्योतिका कालरा।

क्या बिना गॉडफादर के करियर बनाना वकील के लिए सफल नहीं हो सकता?

ज्योतिका कालरा इस बात को नहीं मानती हैं। उनका कहना है, “बिना गॉडफादर के भी कोई वकील सफल हो सकता है। सफलता के लिए गॉडफादर की नहीं, बल्कि मेहनत और प्रैक्टिस की जरूरत होती है। जरूरत होती है कि आप अपनी बात किस तरीके से रखते हैं, सामने वाले वकील को बहस में कैसे जवाब देते हैं और आपने कितना अध्ययन किया है। अगर गॉडफादर है तो अच्छी बात है, लेकिन अगर नहीं भी है तो ऐसा जरूरी नहीं है कि वकील सफल नहीं हो सकता।”

वकालत की पढ़ाई और कोर्ट की असली दुनिया दोनों में कितना फर्क?

वकालत की पढ़ाई और कोर्ट की असली दुनिया में जमीन-आसमान का फर्क होता है। कॉलेज में पढ़ाई या IPC की धारा केवल लिखाई तक सीमित रहती हैं। बिना कोर्टरूम में गए आप वकील नहीं बन सकते। जब तक प्रैक्टिस नहीं करेंगे और कोर्टरूम की प्रक्रिया नहीं समझेंगे, तब तक वकील बनना संभव नहीं है। आजकल वकालत की पढ़ाई के साथ कम से कम तीन महीने किसी वकील के पास प्रैक्टिस करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि कंपटीशन बहुत ज्यादा है। बड़े से बड़े कॉलेज से पढ़ाई कर लेने के बाद भी बिना कोर्ट अनुभव के वकील नहीं बना जा सकता।

कानून और न्याय क्या दोनों अलग हैं?

ज्योतिका कालरा का कहना है कि कानून और न्याय दोनों एक नहीं हो सकते। न्याय के लिए लड़ाई भावनाओं से नहीं, बल्कि कानून के आधार पर लड़ी जाती है। अगर किसी व्यक्ति पर मर्डर का केस है तो वकील यह नहीं सोचता कि उसने अपराध किया तो जेल जाना चाहिए। बल्कि यह देखता है कि FIR, जांच और ट्रायल कानून के अनुसार हुए हैं या नहीं। कोर्ट में सबूत चलते हैं। आरोप साबित हुए या नहीं, उसी के आधार पर फैसला होता है। क्योंकि कानून तो अंधा है, कानून कुछ देखा नहीं है।

क्या इंसाफ पाना मुश्किल और महंगा है?

देश में करोड़ों मामले लंबित हैं, इसलिए इंसाफ मिलना आसान नहीं है और इसमें समय लगता है। इंफ्रास्ट्रक्चर और जजों की कमी भी एक बड़ी वजह है। हर कोर्ट में लीगल एड विंग होती है, जहां मुफ्त में मुकदमे लड़े जाते हैं, लेकिन बड़े और महत्वपूर्ण मामलों में निजी वकील हायर किए जाते हैं, जिनकी फीस उनकी टीम, रिसर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण ज्यादा होती है।

महिला वकीलों की चुनौतियां

महिला वकीलों को जेंडर के आधार पर देखा जाता है। कई बार क्लाइंट को संदेह होता है कि महिला वकील केस ठीक से लड़ पाएगी या नहीं। लेकिन जब महिला वकील कोर्ट में अपनी परफॉर्मेंस कोर्टरूम दिखाती है, तब जेंडर पीछे रह जाता है और उसकी मेहनत या क्षमता ही दिखाई देती है।

आम आदमी कोर्ट से क्यों डरता है?

समय, पैसा और सिस्टम- तीनों वजहों से आम आदमी कोर्ट जाने से डरता है। केवल आम आदमी ही नहीं बल्कि कोई खास व्यक्ति के लिए भी ऐसा होता है, वह भी कोर्ट में जाने से पहले सौ बार सोचेगा। समय लगता है, यह सब को पता है। कोर्ट में करोड़ों मामले पेंडिंग है तो समय लगना लाजमी है। इसके अलावा अगर आप एक अच्छा वकील चाहते हो तो वह महंगा ही होगा। क्योंकि महंगे वकील के पास मेहनत ज्यादा होती है, उसके पास काफी फाइल्स हैं और सभी को पढ़ना जरूरी होता है। एक फाइल को पढ़ने में कम से कम एक घंटा तो लग ही जाता है।

गरीब और अमीर दोनों के लिए क्या कानून अलग है?

ज्योतिका कालरा का कहना है कि समाज में यह सवाल सबसे ज्यादा उठता है। इस बात में कितनी सच्चाई है, यह जानना बहुत जरूरी है। अमीरों और गरीबों के लिए सब कुछ अलग-अलग है। चाहे घर हो या फिर स्कूल या कॉलेज तो कानून तो अलग होगा ही, लेकिन ऐसा नहीं है कि गरीबों को न्याय मिलना आसान नहीं होता। एक व्यक्ति के भाई का मर्डर हो जाता है। वह पहले जिला कोर्ट में इंसाफ के लिए लड़ाई लड़ता है, अगर उसकी वहां नहीं सुनी जाती तो वह हाईकोर्ट चला जाता है, लेकिन जब हाई कोर्ट भी पीड़ित की कोई नहीं सुनता तो वह सुप्रीम कोर्ट के लीगल एड की मदद लेता है अंत में आकर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से आरोपियों को समन भेज दिया जाता है। मतलब साफ है कि लड़ाई लड़ने के लिए गरीब और अमीर से ज्यादा साहस की जरूरत है। एक व्यक्ति किस तरीके से अपने मुकदमे को लड़ता है यह बेहद जरूरी है। कभी-कभी बड़े से बड़ा आदमी भी केस को हार जाता है और एक गरीब और छोटा आदमी के जीत जाता है।

कोर्ट जाने से पहले समझौता सही है?

अगर विवाद कोर्ट पहुंचने से पहले ही आपसी सहमति से सुलझ जाए तो यह सबसे बेहतर होता है, क्योंकि कोर्ट में फैसला एक व्यक्ति के पक्ष में और दूसरे के खिलाफ जाता है।

सेक्सुअल हैरेसमेंट के मामलों में पीड़िता सबसे बड़ी गलती क्या करती है?

सेक्सुअल हैरेसमेंट में सबसे इंपोर्टेंट है कि आप अपने केस को किस तरीके से कोर्ट में पेश कर रही हो। आपको मानसिक और शारीरिक दोनों तरीके से मजबूत होना पड़ेगा। सबसे बड़ी बात है कि जब महिला के शोषण की बात आती है तो समाज बैक फुट पर आ जाता है। उसी तरीके से जब सेक्सुअल हैरेसमेंट की बात आएगी तो समाज तब भी बैक फुट पर आ जाएगा और अधिकतर केस में होता है कि जब कोई पीड़िता न्याय की मांग करती है तो उसके केस में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली जाती, कारण क्योंकि मन में सवाल होता है कि यह केस फर्जी हो सकता है। इसके अलावा पीड़िता सोचती है कि वह परेशान है और उसका शोषण हुआ है तो सब उसके पक्ष में होंगे। वकील फ्री में केस लड़ेगा। कानून और प्रशासन भी उसको न्याय दिलाने में मदद करेगा, लेकिन ऐसा नहीं होता। पीड़िता को अकेले ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी।

महिला अपने साथ हुए अत्याचार के खिलाफ लड़ना चाहें और परिवार साथ ना दे तो क्या करें?

ज्योतिका का मानना है कि यह तो उस महिला पर निर्भर करता है। अगर कोई महिला लव मैरिज करना चाहती है तो प्यार भी परिवार या समाज के लिए अपराध है। परिवार उस शादी के खिलाफ होता है, लेकिन कुछ लड़कियां लव मैरिज के लिए क्रांति करती हैं तो यह अपने ऊपर निर्भर करता है। महिला का सक्षम होना जरूरी है।

न्याय में देरी होने का बड़ा कारण क्या?

कोर्ट में जजों के कई पद खाली हैं, जिससे मामलों की सुनवाई में देरी होती है। इंफ्रास्ट्रक्चर और बजट बढ़ाने से ही “तारीख पर तारीख” की समस्या कम हो सकती है।

NHRC में शिकायत कैसे करें?

मानवाधिकार हनन की स्थिति में NHRC की वेबसाइट या ऑफलाइन लेटर के माध्यम से शिकायत की जा सकती है। शिकायत में संबंधित व्यक्ति या संस्थान का सही पिन कोड देना जरूरी है, वरना नोटिस वापस आ जाता है।

कोर्ट को सोशल मीडिया ट्रायल का खतरा

न्याय के लिए सोशल मीडिया ट्रायल बहुत खतरनाक है। आजकल कोर्ट भी डरती है कि जो पब्लिक ऑपिनियन बन गया है, उसके खिलाफ जाऊं या ना जाऊं। कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि वह अपने किसी भी फैसले को लेकर सोशल मीडिया से प्रभावित नहीं होंगे, यह लाजमी है और ऐसा ही होना चाहिए। आपके सामने जो सबूत आए हैं, जो कानून है और जो परिभाषा है, उसकी उसके हिसाब से फैसला लेना चाहिए।

अच्छा वकील कैसे बनें?

अच्छा वकील कभी भी कॉलेज से अच्छे नंबर लाकर नहीं बन सकता। आप चाहे 90% नंबर लेकर आ जाओ या फिर 65% नंबर। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह तो 24 घंटे काम करने के बाद मिलने वाली सफलता है। अगर आपको वकील बनना है तो 24 घंटे सोचना पड़ेगा कि उस केस में हम क्या कर सकते हैं? क्योंकि कोर्ट रूम एक ऐसी जगह है, जहां पर आप रोजाना हारते हो और रोजाना जीत जाते हो।

RTI के गलत जवाब की समस्या

कई बार RTI में “पर्सनल इंफॉर्मेशन” का हवाला देकर जवाब नहीं दिया जाता, जिसे कोर्ट भी मान लेती है। यह सिस्टम और नियमों की समस्या है।

IPC और BNS में फर्क क्या?

BNS लागू होने से कुछ बदलाव हुए हैं, लेकिन पूरे सिस्टम में बड़ा बदलाव आने में समय लगेगा।

करप्शन कैसे कम होगा?

ज्योतिका मानना है कि करप्शन फ्री इंडिया बनाने के लिए एक बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत पड़ेगी, लेकिन हमारे देश में वह संख्या अभी नहीं है।

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Published : 
  • 22 February 2026, 6:02 PM IST