जब कानून के गलत इस्तेमाल पर फूटा सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा, जानिए क्या है ITS अधिकारी की इस सनसनीखेज जीत की पूरी कहानी

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व ITS अधिकारी को जबरन समय से पहले रिटायर करने के फैसले को मनमाना करार देते हुए रद्द कर दिया है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 10 September 2026, 3:04 PM IST

New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन ट्रेड सर्विस (ITS) के एक पूर्व अधिकारी को समय से पहले अनिवार्य रूप से रिटायर करने के मामले में केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने सरकार के इस कदम को मनमाना और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए रिटायरमेंट के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि अधिकारी को मानहानि और कानूनी खर्च के लिए 15 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।

प्रमोशन के सिर्फ दो महीने बाद अनिवार्य रिटायरमेंट

यह मामला 1989 बैच के इंडियन ट्रेड सर्विस अधिकारी से जुड़ा है। अधिकारी का सर्विस रिकॉर्ड बहुत अच्छा था और उन्हें लगातार अच्छी परफॉर्मेंस रेटिंग मिलती रही थी। फरवरी 2018 में, UPSC की मंज़ूरी के बाद, मेरिट के आधार पर उन्हें जॉइंट सेक्रेटरी के पद पर प्रमोट किया गया था। हालांकि, प्रमोशन के सिर्फ दो महीने बाद 10 मई 2018 को उन्हें फंडामेंटल रूल 56(j) के तहत अनिवार्य रूप से रिटायर कर दिया गया। सरकार की रिव्यू कमिटी ने कुछ पुराने गोपनीय रिकॉर्ड्स के आधार पर उन्हें 'बेअसर' (या 'डेडवुड') करार दिया था।

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CAT और हाई कोर्ट के बाद अधिकारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे

अधिकारी ने अनिवार्य रिटायरमेंट और 'डेडवुड' करार दिए जाने के फैसले को पहले सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) और बाद में दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। वहां से राहत न मिलने पर वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इस मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने की। कोर्ट ने कहा कि UPSC की मंजूरी से ऊंचे पद पर प्रमोट किए जाने के बाद अचानक और बिना किसी नए नकारात्मक रिकॉर्ड के किसी अधिकारी को 'बेअसर' घोषित करना अन्यायपूर्ण था।

SC ने कहा- दोनों फैसले एक साथ नहीं चल सकते

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि एक तरफ तो विभाग अधिकारी को बड़ी ज़िम्मेदारी के काबिल मानकर प्रमोट करता है और दूसरी तरफ उसके कुछ ही समय बाद उन्हें 'डेडवुड' करार देकर नौकरी से हटा देता है। ये दोनों फैसले एक-दूसरे के उलट हैं। कोर्ट ने माना कि अधिकारी के खिलाफ की गई कार्रवाई मनमानी थी और यह सत्ता का दुरुपयोग था। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि किसी सरकारी कर्मचारी को बिना ठोस आधार के अनिवार्य रूप से रिटायर नहीं किया जा सकता।

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सरकार को देने होंगे 15 लाख रुपये मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि वह अधिकारी को मानहानि के लिए 9 लाख रुपये और कानूनी लड़ाई के खर्च के तौर पर 6 लाख रुपये का मुआवजा दे। इसके अलावा उन्हें नौकरी से जुड़े सभी फायदे दिए जाएंगे मानो उन्हें कभी अनिवार्य रूप से रिटायर न किया गया हो। अगर इस दौरान उनके किसी जूनियर को प्रमोशन मिला हो तो वे भी 'नोशनल प्रमोशन' के फायदे के हकदार होंगे।

DGFT कार्यालय बुलाकर देनी होगी सम्मानजनक विदाई

कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वे अधिकारी को डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) ऑफिस बुलाएं और उन्हें सम्मानजनक विदाई दें। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी को वही सम्मान मिलना चाहिए जो उन्हें उनके सामान्य रिटायरमेंट के दिन मिलता।

Location :  New Delhi

Published :  10 September 2026, 3:04 PM IST