
सुप्रीम कोर्ट (IMG: Pinterest)
New Delhi: पुलिस किसी व्यक्ति को हिरासत में रखे, उससे पूछताछ करे और फिर कई घंटे बाद कागजों में उसकी गिरफ्तारी दिखाए, अब इस तरह की प्रक्रिया पर कानूनी सवाल और गंभीर हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए निर्धारित 24 घंटे की समय-सीमा उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने से नहीं, बल्कि वास्तविक हिरासत में लिए जाने के समय से शुरू होगी। यानी पुलिस किसी व्यक्ति की आजादी पर रोक लगाने के बाद गिरफ्तारी की औपचारिक कार्रवाई में देरी करके 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा को आगे नहीं बढ़ा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेना और औपचारिक रूप से गिरफ्तार करना, दोनों का असर उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर पड़ता है। अगर पुलिस किसी व्यक्ति को अपने साथ ले जाती है, उसे थाने या किसी दूसरी जगह रोककर रखती है और उसे अपनी इच्छा से जाने की अनुमति नहीं देती, तो केवल यह कह देने से कि अभी उसकी औपचारिक गिरफ्तारी नहीं हुई है, हिरासत की वास्तविक स्थिति नहीं बदल जाती। अदालत के मुताबिक, किसी व्यक्ति की आजादी पर रोक लगने का समय ही इस मामले में महत्वपूर्ण है। पुलिस रिकॉर्ड में गिरफ्तारी का समय बाद में दर्ज कर देने से वास्तविक हिरासत शुरू होने का समय नहीं बदल सकता। इसलिए मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की अवधि की गणना वास्तविक हिरासत से की जाएगी।
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आमतौर पर गिरफ्तारी का मतलब किसी व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया के तहत पुलिस के नियंत्रण में लेना और उसके खिलाफ गिरफ्तारी की औपचारिक कार्रवाई पूरी करना होता है। वहीं हिरासत का मतलब है किसी व्यक्ति की गतिविधियों और आने-जाने की आजादी पर रोक लगाना। कई बार पुलिस किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए अपने साथ ले जाती है और उसे थाने या जांच एजेंसी के कार्यालय में रोककर रखती है। ऐसे में पुलिस यह कह सकती है कि व्यक्ति को अभी औपचारिक रूप से गिरफ्तार नहीं किया गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए व्यक्तियों को कुछ महत्वपूर्ण अधिकार देता है। इसके तहत किसी गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार की जानकारी देना और उसे अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार देना जरूरी है। अनुच्छेद 22(2) के मुताबिक, गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा में लगने वाले जरूरी समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना इस अवधि से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग हाईकोर्ट के उन फैसलों पर भी सवाल उठाया, जिनमें गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की व्याख्या करते समय केवल कानूनी शब्दों के तकनीकी अर्थ तक सीमित नहीं रहा जा सकता। यह देखना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर वास्तव में कब रोक लगाई गई।
Location : New Delhi
Published : 5 November 2026, 12:37 PM IST
Topics : Article 22 Constitution Fundamental Rights police custody Supreme Court judgment Supreme Court