हिंदी
मात्र 13 वर्ष की उम्र के क्रांतिकारी ( file photo)
New Delhi: भारत की आजादी की कहानी में कई ऐसे क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने छोटी उम्र में ही देश के लिए संघर्ष शुरू कर दिया था। मन्मथनाथ गुप्त भी ऐसे ही स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लिया, जेल की सजा काटी और आजादी के संघर्ष को अपनी लेखनी के जरिए लोगों तक पहुंचाया। काकोरी कांड में उनकी भूमिका भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। 26 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर उनके साहस और योगदान को याद किया जा सकता है।
मन्मथनाथ गुप्त का जन्म 7 फरवरी 1908 को वाराणसी में हुआ था। उनके पिता का नाम वीरेश्वर गुप्त था। बचपन से ही उनके मन में देश के प्रति प्रेम था। जब वह किशोर अवस्था में थे, तब भारत में अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की आवाज तेज हो रही थी। साल 1921 में उन्होंने ब्रिटेन के युवराज के भारत दौरे के विरोध में पर्चे बांटे। इस दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तीन महीने की जेल की सजा दी। इतनी कम उम्र में जेल जाने के बावजूद उनके हौसले कमजोर नहीं पड़े। जेल से बाहर आने के बाद भी उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेना जारी रखा।
मन्मथनाथ गुप्त का नाम 9 अगस्त 1925 के काकोरी ट्रेन कांड से जुड़ा है। उस समय वह केवल 17 वर्ष के थे। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रांतिकारियों के साथ वह अंग्रेजी सरकार के खजाने को लूटने की योजना में शामिल हुए थे। क्रांतिकारियों का उद्देश्य अंग्रेजी शासन से देश को बचाने के संघर्ष के लिए धन जुटाना था।
इस घटना के बाद अंग्रेज सरकार ने बड़े स्तर पर गिरफ्तारियां कीं। मन्मथनाथ गुप्त को भी गिरफ्तार किया गया। मुकदमे के बाद उन्हें 14 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। काकोरी कांड में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी दी गई। वहीं, कम उम्र के मन्मथनाथ गुप्त को जेल की सजा मिली।
मन्मथनाथ गुप्त का योगदान केवल क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने लेखन के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन की घटनाओं और क्रांतिकारियों के जीवन को सामने रखा। उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला भाषाओं में कई पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास', 'चंद्रशेखर आजाद' और 'क्रांति युग के अनुभव' शामिल हैं। उनकी पुस्तकें आजादी की लड़ाई को समझने और क्रांतिकारियों के संघर्ष को जानने में मदद करती हैं।
मन्मथनाथ गुप्त का निधन 26 अक्टूबर 2000 को अपने घर निजामुद्दीन दिल्ली में हुआ था। उन्होंने अपना जीवन देश की आजादी के संघर्ष और क्रांतिकारी इतिहास को दर्ज करने में लगाया। उनका जीवन बताता है कि देश के लिए काम करने की कोई उम्र नहीं होती। उनका साहस, संघर्ष और लेखन आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान की याद दिलाता रहेगा।
Location : New Delhi
Published : 26 October 2026, 11:06 AM IST