
सुप्रीम कोर्ट (सोर्स- Pinterest)
New Delhi: राजस्थान के प्रसिद्ध महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों के बीच चल रहे लंबे कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह निर्णय लिया है। साथ ही, अदालत ने दोनों पक्षों को आठ दिनों के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त और भावनात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि भगवान को इस तरह परेशान नहीं किया जाना चाहिए। पीठ ने दोनों संप्रदायों से सवाल किया कि क्या वे चाहते हैं कि सुबह एक संप्रदाय अपनी रीति से पूजा करे और शाम को दूसरा संप्रदाय भगवान के वस्त्र बदलकर अपनी पद्धति से अनुष्ठान करे? अदालत ने कहा कि भगवान महावीर इस धरती पर जन्मे सबसे महान संतों में से एक हैं और इस तरह की मुकदमेबाजी से वे कभी प्रसन्न नहीं होंगे। न्यायमूर्तियों ने दोनों पक्षों से आपसी सहमति से इस विवाद को सुलझाने की अपील भी की।
यह पूरा विवाद राजस्थान सार्वजनिक न्यास अधिनियम 1959 की धारा 40 के तहत दायर उस आवेदन से शुरू हुआ था, जिसमें दिगंबर समिति के पदाधिकारियों को हटाकर श्वेतांबर प्रबंधन समिति बनाने की मांग की गई थी। साल 1994 में ट्रायल कोर्ट ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के आधार पर इस कार्यवाही को समाप्त कर दिया था। हालांकि, बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार कर लिया, जिसके बाद दिगंबर समिति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत में सुनवाई के दौरान दिगंबर समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम ने तर्क दिया कि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही पहले ही समाप्त हो चुकी थी, इसलिए हाईकोर्ट को अपील पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी। वहीं, प्रतिवादी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलील दी कि वे मंदिर के धर्म परिवर्तन की मांग नहीं कर रहे हैं, इसलिए 1991 का अधिनियम यहां लागू नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह केवल 1991 के अधिनियम की धारा 4 के लागू होने से जुड़े सीमित कानूनी सवाल पर ही विचार करेगा।
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एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने वाले कानूनी प्रावधान की सांविधानिक वैधता की जांच करने का निर्णय लिया है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ अगले महीने से इस मामले पर विस्तृत सुनवाई शुरू करेगी। यह मामला भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के अपवाद-2 और नए कानून भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 63 के उस प्रावधान को चुनौती देता है, जिसके तहत वयस्क पत्नी के साथ बिना सहमति के बनाए गए शारीरिक संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जाता है। अदालत ने कहा कि वह यह परखेगी कि क्या यह अपवाद संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं।
Location : New Delhi
Published : 10 September 2026, 9:13 AM IST
Topics : Mahavir Ji Jain Temple Marital Rape Case Rajasthan Public Trusts Act Shwetamber Digamber Dispute Supreme Court