इजरायल-ईरान संघर्ष गहराया, भारत ने शुरू की संवाद की पहल…लेकिन सामने खड़ी है ये तीन मुश्किलें; जानें क्या?

इजरायल-ईरान युद्ध के बीच भारत ने बातचीत और कूटनीति की पहल की है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दोनों देशों और खाड़ी राष्ट्रों से संपर्क किया। भारतीयों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक संतुलन भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां बनकर उभरी हैं।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 1 March 2026, 11:13 AM IST

New Delhi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के कुछ ही समय बाद पश्चिम एशिया में हालात अचानक बिगड़ गए। अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर हमले के बाद ईरान ने कतर, बहरीन और यूएई में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। क्षेत्रीय तनाव बढ़ते ही भारत ने तुरंत सक्रिय कूटनीतिक पहल शुरू की।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इजरायल के विदेश मंत्री गिदोन सार और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरघची से अलग-अलग बातचीत कर संयम, संवाद और कूटनीति का आग्रह दोहराया। ऐसे में इजरायल-ईरान युद्ध को लेकर भारत के सामने ये तीन चुनौतियां खड़ी है। आइए एक-एक करके तीनों चुनौतियों को विस्तार से समझते हैं।

चुनौती 1: 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा

पश्चिम एशिया भारत के लिए केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टि से भी बेहद अहम है। इजरायल में करीब 41 हजार और ईरान में लगभग 10 हजार भारतीय मौजूद हैं। पूरे खाड़ी क्षेत्र में 80 से 90 लाख भारतीय काम करते हैं।

तेल अवीव, तेहरान और अन्य राजधानियों में भारतीय दूतावासों ने एडवाइजरी जारी की है। एयरस्पेस बंद होने और उड़ानें रद्द होने से स्थिति और जटिल हो गई है। भारतीयों की सुरक्षा और संभावित निकासी भारत सरकार की पहली प्राथमिकता बन गई है।

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चुनौती 2: ऊर्जा सुरक्षा और होर्मुज का संकट

भारत अपनी लगभग 60 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतें इसी क्षेत्र से पूरी करता है। होर्मुज जलडमरूमध्य तेल आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता भारत के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक चिंता है।

ईरान में बढ़ा तनाव (Img- Internet)

चुनौती 3: रणनीतिक संतुलन की परीक्षा

भारत के सामने सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती संतुलन बनाए रखना है। एक ओर इजरायल उसका रणनीतिक साझेदार है, तो दूसरी ओर ईरान ऐतिहासिक सहयोगी और पड़ोसी है। दिल्ली ने अपने बयान में संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की बात कही, जिसे ईरान के प्रति सहानुभूति के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। वहीं भारत ने किसी पक्ष का खुला समर्थन करने से परहेज किया है।

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रणनीतिक स्वायत्तता की राह

यह स्थिति कुछ हद तक रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत की नीति से मेल खाती है, जब नई दिल्ली ने संतुलन की रणनीति अपनाई थी। इस बार भी भारत संवाद और शांतिपूर्ण समाधान पर जोर दे रहा है।

स्पष्ट है कि इजरायल-ईरान टकराव के बीच भारत की कूटनीतिक पहल सक्रिय है, लेकिन भारतीयों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक संतुलन ये तीन बड़ी चुनौतियां उसकी राह को जटिल बना रही हैं। आने वाले दिनों में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा होगी।

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  • New Delhi

Published : 
  • 1 March 2026, 11:13 AM IST