एपस्टीन फाइल्स सिर्फ अपराध का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि सत्ता, पैसा और वैश्विक नेटवर्क का जटिल जाल दिखाती हैं। करोड़ों दस्तावेज़ों में कई बड़े नामों के संपर्क सामने आए, लेकिन सच, आरोप और अफवाह के बीच की रेखा अब भी धुंधली है। असली रहस्य शायद अभी बाकी है।

एपस्टीन फाइल्स से दुनिया की एलीट लॉबी पर फिर उठे सवाल
New Delhi: जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी “एपस्टीन फाइल्स” आज सिर्फ एक क्राइम केस का हिस्सा नहीं रहीं, बल्कि यह दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोगों के नेटवर्क, सत्ता संरचना और न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता पर बहस का केंद्र बन चुकी हैं। हाल के वर्षों में अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट द्वारा लाखों पन्नों के दस्तावेज़ सार्वजनिक किए जाने के बाद यह मामला फिर वैश्विक चर्चा में आ गया है।
एपस्टीन फाइल्स का यह मामला अमेरिका की आपराधिक जांच से लेकर भारत समेत कई देशों की राजनीति, कारोबार और वैश्विक रिश्तों की चर्चा तक पहुंच गया है। जहां अमेरिका में सत्ता, सिस्टम और पारदर्शिता पर सवाल उठे, वहीं भारत में जुड़े दावों ने तथ्य, अफवाह और अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव की बहस को और तेज कर दिया है।
2025–2026 में पारदर्शिता कानून के तहत अमेरिकी न्याय विभाग ने एपस्टीन केस से जुड़े करोड़ों दस्तावेज़ सार्वजनिक करने की प्रक्रिया शुरू की। जनवरी 2026 में करीब 35 लाख दस्तावेज़ जारी किए गए, जिनमें ईमेल, रिपोर्ट, फोटो, वीडियो और जांच रिकॉर्ड शामिल थे।
इन फाइलों का मकसद एपस्टीन के नेटवर्क, उसके सहयोगियों और जांच प्रक्रिया को सार्वजनिक करना था। हालांकि, पीड़ितों की पहचान छिपाने और चल रही जांच को नुकसान से बचाने के लिए कई हिस्सों को अभी भी ब्लैकआउट या हटाया गया है।
नई फाइल्स से यह संकेत मिला कि एपस्टीन सिर्फ एक अपराधी नहीं था, बल्कि वह वैश्विक एलीट नेटवर्क में गहराई तक जुड़ा हुआ था। कई शक्तिशाली लोग उसके संपर्क में थे भले ही उन पर अपराध साबित नहीं हुआ। यह पहलू इस केस को अलग बनाता है। यह दिखाता है कि कैसे पैसा, राजनीति और प्रभाव कभी-कभी अपराध के मामलों को जटिल बना देते हैं।
कुछ दस्तावेज़ों में कई बड़े बिजनेस और राजनीतिक लोगों के संपर्क या बातचीत का जिक्र सामने आया है। उदाहरण के तौर पर रिपोर्ट में यह दावा सामने आया कि कुछ अंतरराष्ट्रीय बिजनेस कनेक्शन और राजनीतिक बातचीत ईमेल्स में दर्ज थीं। ध्यान देने वाली बात यह है कि किसी का नाम आना अपराध साबित नहीं करता और कई नाम केवल संपर्क, यात्रा या सोशल नेटवर्किंग से जुड़े हो सकते हैं।
एपस्टीन फाइल्स का विस्फोट
कुछ दस्तावेज़ों में यह दावा किया है कि भारतीय उद्योगपति अनिल अंबानी 2017–2019 के बीच एपस्टीन से संपर्क में थे और राजनीतिक या बिजनेस को लेकर चर्चा हुई थी, लेकिन ऐसे मामलों में जांच और संदर्भ बहुत जरूरी होते हैं। हर दावा अपराध साबित नहीं करता और कई दावे केवल कम्युनिकेशन स्तर पर होते हैं। जहां तक पीएम मोदी से जुड़ी बातें हैं, अभी तक विश्वसनीय मुख्यधारा की रिपोर्टिंग में कोई ठोस पुष्टि नहीं है और कई दावे सोशल मीडिया या वीडियो पर आधारित हैं, जिनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
2026 में इस मामले ने फिर सुर्खियां बटोरी। कुछ हजार दस्तावेज़ पीड़ितों की सुरक्षा के कारण वेबसाइट से हटा दिए गए, जबकि सांसदों को बिना एडिट किए दस्तावेज़ देखने की अनुमति दी गई। इन नए दस्तावेज़ों के सामने आने से कई नए नाम और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन उजागर हुए।
जांच के अनुसार, यह नेटवर्क अमीर और ताकतवर लोगों से संपर्क बनाने, वित्तीय डील और सामाजिक नेटवर्किंग को बढ़ावा देने, कमजोर लोगों को टारगेट करने और निजी संपत्तियों का इस्तेमाल करने पर आधारित था। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह मॉडल सिर्फ व्यक्तिगत लाभ तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें एक संरचित पैटर्न था जो “इन्फ्लुएंस नेटवर्किंग + क्राइम” का मिश्रण प्रस्तुत करता था। इसके तहत ताकत और प्रभाव का इस्तेमाल आर्थिक और सामाजिक दबाव बनाने के लिए किया जाता था।
अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि किसी आधिकारिक “सीक्रेट क्लाइंट लिस्ट” का कोई सबूत नहीं मिला है। हालांकि, कई नाम दस्तावेज़ों में, फ्लाइट लॉग या ईमेल रिकॉर्ड में दर्ज पाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं कि ये सभी अपराध से जुड़े थे। अधिकांश रिकॉर्ड केवल संपर्क, यात्रा या पेशेवर बातचीत को दर्शाते हैं। इसलिए किसी का नाम आना सीधे तौर पर गलत काम या कानून तोड़ने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
आलोचकों का कहना है कि कई दस्तावेज़ अभी भी छिपे हैं और जांच पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कुछ रिकॉर्ड कानूनी कारणों से रोके गए हैं। इसीलिए, एपस्टीन फाइल्स अभी भी एक “खुलती कहानी” हैं, जिनमें नए नाम और जानकारी सामने आने की संभावना बनी हुई है।
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एपस्टीन फाइल्स सिर्फ एक अपराधी की कहानी नहीं हैं। यह केस बताता है कि कैसे वैश्विक स्तर पर पैसा, राजनीति और प्रभाव आपस में जुड़ सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि दस्तावेज़ों में नाम आने और अपराध साबित होने में बड़ा अंतर होता है।
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