
दिल्ली अपराध में इस्तेमाल हुई बस (Img: X)
New Delhi: दिल्ली-NCR में 4 अगस्त को चलती बस में 16 वर्षीय नाबालिग के साथ कथित गैंगरेप की घटना ने सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद एक बार फिर 2012 के निर्भया कांड की यादें ताजा हो गई हैं। सुरक्षा के लिए बसों में कई नियम पहले से लागू हैं, लेकिन उनका पालन कितना हो रहा है, यह बड़ा सवाल है।
4 अगस्त की रात दिल्ली में 11वीं कक्षा में पढ़ने वाले 16 वर्षीय छात्र के साथ चलती बस में ड्राइवर और कंडक्टर ने कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म किया। आरोप है कि घटना को अंजाम देने के बाद दोनों ने नाबालिग को कश्मीरी गेट के पास रिंग रोड पर छोड़ दिया और वहां से फरार हो गए।
पीड़ित की शिकायत मिलने के बाद कश्मीरी गेट थाना पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। घटना ने सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस घटना के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाए गए।सार्वजनिक परिवहन में भी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया गया।
बसों में निगरानी, आपातकालीन सहायता और ड्राइवर-कंडक्टर के सत्यापन जैसे नियम इसी सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसके बावजूद अगर चलती बस में ऐसी गंभीर घटना होती है, तो नियमों के पालन और निगरानी की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों की सुरक्षा के लिए बसों में व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) और पैनिक बटन की व्यवस्था जरूरी है। VLTD की मदद से बस की लोकेशन पर नजर रखी जा सकती है। वहीं, पैनिक बटन किसी आपात स्थिति में यात्रियों के लिए मदद मांगने का जरिया है। इसे ऐसी जगह लगाया जाना चाहिए, जहां जरूरत पड़ने पर यात्री आसानी से इसका इस्तेमाल कर सकें। इन उपकरणों का काम करना भी उतना ही जरूरी है, जितना उनका बस में लगा होना।
बस संचालकों के लिए ड्राइवर, कंडक्टर और दूसरे कर्मचारियों का पुलिस सत्यापन कराना जरूरी है। ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस होना चाहिए। इसके अलावा कर्मचारियों को निर्धारित यूनिफॉर्म पहननी होती है और उनके पास PSV यानी पब्लिक सर्विस व्हीकल बैज होना चाहिए। इन नियमों का मकसद यात्रियों को सुरक्षित यात्रा का माहौल देना है।
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यात्रियों की सुरक्षा के लिए बस के अंदर की गतिविधियां बाहर से दिखाई देना जरूरी माना गया है। इसी वजह से खिड़कियों पर पर्दे लगाने और काली या टिंटेड फिल्म का इस्तेमाल करने पर रोक है। बस के अंदर क्या हो रहा है, यह बाहर से दिखाई देने पर किसी आपात स्थिति में पुलिस या दूसरे लोग तेजी से मदद कर सकते हैं। ऐसे में नियमों का उल्लंघन सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।
नियमों के तहत रात या कम भीड़ वाले समय में बसों को सुनसान जगहों पर खड़ा करने से बचना चाहिए। बसों की पार्किंग अधिकृत, सुरक्षित और पर्याप्त रोशनी वाली जगह पर होनी चाहिए। इस व्यवस्था का उद्देश्य बस में मौजूद यात्रियों और कर्मचारियों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
अगर बस में किसी महिला या बच्चे के साथ छेड़छाड़, उत्पीड़न या दूसरी आपराधिक घटना होती है तो ड्राइवर और कंडक्टर की जिम्मेदारी है कि वे तुरंत पुलिस को सूचना दें। जरूरत पड़ने पर बस को नजदीकी पुलिस स्टेशन या PCR वैन तक ले जाने का भी प्रावधान है। ऐसे मामलों में देरी से पीड़ित की परेशानी बढ़ सकती है और आरोपी को भागने का मौका मिल सकता है।
4 अगस्त की घटना ने यह सवाल फिर सामने ला दिया है कि केवल नियम बनाना पर्याप्त है या नहीं। बसों में सुरक्षा उपकरणों की नियमित जांच, कर्मचारियों का सत्यापन और नियमों की निगरानी भी जरूरी है। सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित माहौल देना प्रशासन, बस संचालकों और कर्मचारियों की साझा जिम्मेदारी है।
Location : New Delhi
Published : 3 September 2026, 6:47 PM IST