Amarnath Yatra By Car: अमरनाथ गुफा तक आप जा सकेंगे केबल कार से; जानिये पूरी योजना और तकनीक

बाबा बर्फानी के दर्शन की राह देख रहे करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए खुशखबरी सामने आई है। 13 हजार फीट की ऊंचाई पर एक ऐसा अभूतपूर्व काम होने जा रहा है, जो यात्रा के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ देगा। इस नए फैसले से भक्तों का सफर पूरी तरह बदलने वाला है, जानिए क्या है योजना...

Post Published By: Subhash Raturi
Updated : 30 June 2026, 1:24 PM IST

New Delhi: पथरीले रास्ते, हाड़ कंपाने वाली ठंड और ऑक्सीजन की कमी के बीच घंटों की थका देने वाली चढ़ाई... पवित्र अमरनाथ गुफा की यात्रा में आस्था की डगर हमेशा से अग्निपरीक्षा जैसी रही है। लेकिन बहुत जल्द बाबा बर्फानी के दर पर पहुंचने का यह खौफ और थकान इतिहास बनने जा रही है। अब 13 हजार फीट की इस दुर्गम ऊंचाई पर श्रद्धालुओं का सफर पैदल नहीं, बल्कि हवा से बातें करते हुए तय होगा। केंद्र सरकार की हरी झंडी के बाद, अगले दो-तीन साल यानी साल 2029 तक पवित्र गुफा तक केबल कार (रोप-वे) चलाने की तैयारी पूरी कर ली गई है। नेशनल हाईवे लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट लिमिटेड (NHLML) द्वारा तैयार की गई इस खास योजना के टेंडर इसी साल नवंबर-दिसंबर में जारी होंगे और अगले साल अप्रैल से पहाड़ों का सीना चीरकर इस आधुनिक सफर को धरातल पर उतारने का काम शुरू हो जाएगा।

5 से 8 घंटे का सफर अब सिर्फ मिनटों में

प्रोजेक्ट से जुड़े सूत्रों के अनुसार, यह केबल कार बालटाल के डोमेल गेट से शुरू होकर गुफा से लगभग दो किलोमीटर पहले 'संगम टॉप' तक जाएगी। संगम टॉप ही इस केबल कार का आखिरी टर्मिनल स्टेशन होगा। वर्तमान में बालटाल से गुफा तक का पैदल मार्ग 14 किलोमीटर लंबा है, जिसे तय करने में श्रद्धालुओं को 5 से 8 घंटे का समय लग जाता है। 11.6 किलोमीटर लंबे इस केबल कार प्रोजेक्ट के शुरू होने से यह दूरी महज 25 से 30 मिनट में पूरी हो जाएगी। संगम टॉप पहुंचने के बाद श्रद्धालु आगे का दो किलोमीटर का सफर पैदल या पालकी के जरिए तय कर सकेंगे। जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल और श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड के अध्यक्ष मनोज सिन्हा ने भी स्पष्ट किया है कि सरकार का संकल्प हर नागरिक के लिए बाबा बर्फानी के दर्शन को आसान बनाना है, जिसके लिए इस रूट पर स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास तेजी से किया जा रहा है।

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सुरक्षा का रखा गया है विशेष ध्यान

इस केबल कार को वर्तमान पैदल ट्रैक के बिल्कुल समानांतर नहीं बनाया जाएगा। पर्यावरण और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पहाड़ियों और खाइयों के ऊपर से एक 'एरियल स्ट्रेट लाइन' (हवाई सीधा रास्ता) चुनी गई है। हालांकि, यह हवाई रास्ता पैदल ट्रैक के नजदीक ही रहेगा और इसके टर्मिनल भी ट्रैक से जुड़े होंगे, ताकि किसी भी आपातकालीन स्थिति (इमरजेंसी) में श्रद्धालुओं को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके। इसके अलावा, मुख्य गुफा और वहां के प्राकृतिक बर्फ के लिंग (ग्लेशियर) की संवेदनशीलता को बनाए रखने और उसे किसी भी नुकसान से बचाने के लिए केबल कार को गुफा से एक सुरक्षित दूरी (संगम टॉप) पर ही रोका जाएगा।

'पर्वतमाला परियोजना' के तहत 1,200 करोड़ रुपय का बजट

यह प्रोजेक्ट केंद्र सरकार की 'पर्वतमाला परियोजना' के तहत बनाया जा रहा है, जिसके निर्माण की जिम्मेदारी सड़क परिवहन मंत्रालय की नोडल एजेंसी NHLML के पास है। डीपीआर के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट का अनुमानित बजट लगभग 1,200 करोड़ रुपय तय किया गया है। यह जम्मू-कश्मीर में पहले चरण में बनने वाले 16,000 करोड़ रुपय के 8 बड़े रोपवे प्रोजेक्ट्स का एक मुख्य हिस्सा है।

क्षमता में होगी भारी बढ़ोतरी, रोज 20 हजार लोग कर सकेंगे दर्शन

मौजूदा व्यवस्था में श्राइन बोर्ड ने बालटाल रूट से रोजाना केवल 10 हजार पंजीकृत श्रद्धालुओं की संख्या तय की है। लेकिन इस केबल कार के शुरू होने से श्रद्धालुओं की क्षमता में भारी बढ़ोतरी होगी। प्रोजेक्ट के ब्लूप्रिंट के अनुसार, रोटेशन में लगभग 30 से 50 बंद केबिन वाली केबल कारें चलाई जाएंगी, जिसमें प्रत्येक केबिन की क्षमता 6 से 8 यात्रियों की होगी। इस तकनीक से प्रति घंटे 1500 से 2000 श्रद्धालुओं को लाना-ले जाना संभव होगा, जिसका मतलब है कि इसके जरिए रोजाना 20 हजार श्रद्धालु आसानी से दर्शन कर सकेंगे।

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मौसम और निर्माण की कठिन चुनौतियां

यह केबल कार 'ऑल-वेदर' (हर मौसम के अनुकूल) तकनीक से लैस होगी, जो भारी बर्फबारी और तेज हवाओं को झेल सकती है। हालांकि, सर्दियों के मौसम में संगम टॉप से आगे गुफा तक का 2-3 किमी का रास्ता भारी बर्फबारी के कारण बंद हो जाता है, इसलिए यात्रा मुख्य रूप से गर्मियों में ही सुगम हो पाएगी।

निर्माण कार्य के लिहाज से इस प्रोजेक्ट में 'बरारीमार्क' और 'संगम टॉप' सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। बरारीमार्क में तेज बर्फीली हवाओं के भारी दबाव के बीच पिलर खड़े करना बेहद जोखिम भरा काम है। वहीं दूसरी ओर, संगम टॉप का क्षेत्र अत्यधिक एवलांच प्रोन (बर्फ खिसकने वाला क्षेत्र) है, जहाँ पिलर्स को भारी ग्लेशियर के दबाव से सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा, इस ऊंचाई वाले क्षेत्र में काम करने के लिए साल में केवल 4 महीने (जून से अक्टूबर) की ही वर्किंग विंडो उपलब्ध होती है, जिसके भीतर ही निर्माण कार्य को गति देनी होगी।

Location :  New Delhi

Published :  30 June 2026, 1:24 PM IST