
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत (Img: X)
Mumbai: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने नेतृत्व की पारंपरिक परिभाषा से अलग अपनी सोच सामने रखते हुए कहा कि सच्चा नेता वह नहीं होता जो सिर्फ भाषण दे, चुनाव जीते या हमेशा सबसे आगे दिखाई दे। उनके मुताबिक असली नेतृत्व वह है, जो खुद पीछे रहकर दूसरों को आगे बढ़ाए, नए नेताओं को तैयार करे और सफलता का श्रेय पूरी टीम के साथ साझा करे। मुंबई में जेनरेशन Z और अल्फा के छात्रों के साथ संवाद कार्यक्रम में उन्होंने नेतृत्व, समाज, युवाओं और LGBTQ+ समुदाय से जुड़े कई अहम मुद्दों पर अपनी बात रखी।
संवाद कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने कहा कि वह स्वयं को नेता नहीं, बल्कि एक कार्यकर्ता मानते हैं। उन्होंने कहा कि नेतृत्व का मतलब लोगों को सही दिशा दिखाना और उनके भीतर नेतृत्व क्षमता विकसित करना है। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के नेतृत्व में दूसरे लोग भी आगे चलकर नेतृत्व करने योग्य बन जाएं, तभी उसे वास्तविक नेतृत्व कहा जा सकता है।
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भागवत ने कहा कि समाज में अक्सर यह धारणा बना ली जाती है कि जो व्यक्ति अच्छा भाषण देता है या चुनाव जीत जाता है, वही बड़ा नेता होता है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग है। उनके अनुसार, सच्चा नेता वह होता है जो स्वयं से अधिक अपनी टीम और साथियों को आगे बढ़ने का अवसर देता है। वह सम्मान और उपलब्धियों का श्रेय अकेले नहीं लेता, बल्कि सभी के साथ साझा करता है।
आरएसएस प्रमुख ने अपने संबोधन में एक संस्कृत श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि एक अच्छे नेता में ज्ञान, विनम्रता और दूसरों के गुणों की सराहना करने की क्षमता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संघर्ष के समय नेता को योद्धा की तरह मजबूती से खड़ा होना चाहिए, लेकिन सफलता मिलने पर उसका श्रेय पूरी टीम को देना चाहिए।
जेनरेशन Z और अल्फा के छात्रों से बातचीत में भागवत ने कहा कि युवाओं को नेतृत्व को केवल पद, प्रसिद्धि या व्यक्तिगत सफलता से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज और देश के लिए निस्वार्थ भाव से काम करने वाला व्यक्ति ही वास्तविक नेतृत्व का उदाहरण बनता है।
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कार्यक्रम के दौरान LGBTQIA+ समुदाय और समलैंगिक विवाह को लेकर पूछे गए सवाल पर मोहन भागवत ने कहा कि LGBTQ+ समुदाय भारतीय समाज का हिस्सा है और समाज को उन्हें स्वीकार करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय परंपरा में विवाह केवल दो व्यक्तियों के साथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि परिवार निर्माण की संस्था है। इसलिए विवाह की मौजूदा व्यवस्था में किसी भी बदलाव से पहले समाज को उसके लिए तैयार होना होगा।
मोहन भागवत ने कहा कि समलैंगिक जोड़ों के साथ रहने के लिए अलग कानूनी व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है। उनके अनुसार, इसे विवाह का स्वरूप देने के बजाय ऐसा कानूनी ढांचा विकसित किया जा सकता है, जिससे ऐसे जोड़ों के अधिकार सुरक्षित रहें और समाज भी उन्हें स्वीकार कर सके।
Location : Mumbai
Published : 6 August 2026, 8:54 PM IST