
उत्तर भारत में मिला परजीवी का नया खतरनाक रूप (Image Source: Pinterest)
New Delhi: उत्तर भारत में पशुओं पर किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। शोधकर्ताओं ने इचिनोकोकस ग्रैनुलोसस नामक परजीवी के कई खतरनाक जीनोटाइप की पहचान की है, जो भेड़ों और बकरियों में सक्रिय रूप से फैल रहे हैं। यह परजीवी जानवरों से इंसानों में भी पहुंच सकता है और सिस्टिक इचिनोकोकोसिस (हाइडेटिड रोग) जैसी गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है।
हरियाणा के हिसार स्थित लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन किया। शोध के दौरान हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ के बूचड़खानों में 1,049 भेड़ों और बकरियों की जांच की गई। संक्रमित नमूनों की डीएनए जांच में वैज्ञानिकों ने जी1, जी3 और जी6 जीनोटाइप की पहचान की।
अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण खोज यह रही कि जी6 जीनोटाइप पहली बार उत्तर भारत की भेड़ों और बकरियों में स्पष्ट रूप से पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि ये पशु परजीवी के प्रसार की श्रृंखला में पहले से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार यह परजीवी कुत्तों और अन्य कैनिड प्रजातियों के माध्यम से इंसानों तक पहुंच सकता है। यदि दूषित भोजन, पानी या संक्रमित जानवरों के संपर्क में आने के बाद परजीवी के अंडे मानव शरीर में प्रवेश कर जाएं तो उनके लार्वा विभिन्न अंगों में सिस्ट बनाना शुरू कर देते हैं।
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पहले के अध्ययनों में उत्तर भारत के कई मानव मरीजों में भी जी1, जी3, जी5 और जी6 जीनोटाइप पाए जा चुके हैं, जिससे संक्रमण के सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर चिंता और बढ़ गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार हाइडेटिड रोग के लगभग 70 प्रतिशत मामलों में लीवर प्रभावित होता है। इसके अलावा फेफड़े, मस्तिष्क, हड्डियां और गुर्दे भी इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं। कई बार सिस्ट फटने पर गंभीर एलर्जी, संक्रमण और जानलेवा जटिलताएं भी पैदा हो सकती हैं।
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शोधकर्ताओं का मानना है कि इस अध्ययन से यह समझने में मदद मिलेगी कि परजीवी पशुओं और इंसानों के बीच किस प्रकार फैलता है। इससे भविष्य में बेहतर निगरानी, संक्रमण नियंत्रण और रोकथाम की रणनीतियां तैयार की जा सकेंगी।
पड़ताल के मुताबिक इस शोध का सबसे बड़ा संकेत केवल नया जीनोटाइप मिलना नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद "साइलेंट ट्रांसमिशन चेन" है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन इलाकों में पशुपालन, आवारा कुत्तों की संख्या और खुले में पशु अवशेष फेंकने की प्रथा अधिक है, वहां यह परजीवी वर्षों तक बिना किसी बड़े लक्षण के फैल सकता है। चिंता की बात यह है कि इंसानों में हाइडेटिड सिस्ट कई बार 5 से 10 साल तक बिना लक्षण के बढ़ते रहते हैं और बीमारी का पता तब चलता है जब लीवर या फेफड़ों को गंभीर नुकसान हो चुका होता है। इसलिए यह शोध केवल पशु स्वास्थ्य नहीं बल्कि ग्रामीण सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी व्यवस्था के लिए भी चेतावनी माना जा रहा है।
Location : New Delhi
Published : 17 June 2026, 4:30 PM IST
Topics : Echinococcus Granulosus Health Alert Hydatid Disease Public Health Risk Veterinary Research