
इजराइल की राजनीति में भूचाल (सोर्स-एक्स)
New Delhi: इजराइल की राजनीति में फिर बड़ा भूचाल आ गया है। अक्टूबर 2026 में हुए ताजा आम चुनावों के नतीजे आने के बाद देश की संसद यानी नेसेट में त्रिशंकु जैसी स्थिति पैदा हो गई है। किसी भी प्रमुख राजनीतिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, जिसके चलते देश की अरब पार्टियों ने अचानक से सत्ता की चाबी अपने हाथ में ले ली है और वे 'किंगमेकर' की भूमिका में आ खड़ी हुई हैं। यह पूरा घटनाक्रम इजराइली राजनीति की दिशा और दशा दोनों को बदलने की क्षमता रखता है।
इजराइली संसद में कुल 120 सीटें हैं और किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए न्यूनतम 61 सीटों की आवश्यकता होती है। ताजा परिणामों के अनुसार, कार्यवाहक प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी और धार्मिक गठबंधन बहुमत के जादुई आंकड़े से 8 सीटें पीछे रह गया है, जो लगभग 53 से 54 सीटों पर सिमट गया है। वहीं दूसरी ओर, विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाला मध्यमार्गी और विपक्षी गठबंधन भी 48 से 49 सीटों के आसपास है। दोनों ही मुख्य खेमे बहुमत से कोसों दूर हैं।
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इस चुनाव का सबसे बड़ा फेरबदल अरब पार्टियों के प्रदर्शन में देखा गया है। संयुक्त अरब सूची (राअम) और संयुक्त अरब लिस्ट (जिसमें हदाश, बालद और ताल शामिल हैं) ने इस बार शानदार प्रदर्शन करते हुए रिकॉर्ड 17 से 19 सीटें झटक ली हैं। यह संख्या उनकी पिछली ताकत से लगभग दोगुनी है। इजराइल की कुल आबादी का 20 से 22 प्रतिशत हिस्सा अरब नागरिकों का है। इस बार इस वर्ग के मतदाताओं ने न सिर्फ बढ़-चढ़कर मतदान किया, बल्कि अपनी राजनीतिक एकजुटता का ऐसा परिचय दिया कि वे देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक निर्णायक बन गए।
परिणाम सामने आते ही राजनीतिक जोड़-तोड़ शुरू हो गई है। राअम के प्रमुख मंसूर अब्बास और अन्य प्रमुख अरब नेताओं ने संकेत दिए हैं कि वे बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए विपक्षी खेमे के साथ बातचीत करने को तैयार हैं। हालांकि मुख्यधारा के दोनों ही खेमों ने चुनाव प्रचार के दौरान वैचारिक मतभेदों और साझा मूल्यों की कमी का हवाला देते हुए अरब पार्टियों के साथ सीधे गठबंधन से परहेज किया था, लेकिन अब सरकार गठन की मजबूरी इन दावों पर भारी पड़ती दिख रही है।
यह राजनीतिक स्थिति अरब पार्टियों के लिए अपने समुदाय के हक में खड़े होने का सुनहरा अवसर बन गई है। समर्थन के बदले ये दल अपने नागरिकों के सामने मौजूद गंभीर समस्याओं- जैसे कि बढ़ते संगठित अपराध, आवास संकट, सामाजिक भेदभाव और सरकारी बजट में की गई भारी कटौती के स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।
चूंकि दोनों मुख्य खेमों में से किसी के पास भी अपने दम पर सरकार चलाने का बहुमत नहीं है, इसलिए सरकार के गठन से लेकर भविष्य के अविश्वास प्रस्तावों को टालने तक के लिए इन अरब पार्टियों का अप्रत्यक्ष या बाहरी सहयोग अब अनिवार्य हो गया है। इजराइल का यह चुनाव साबित करता है कि संख्या बल के लिहाज से हाशिए पर माने जाने वाले लोग कैसे नीतिगत स्तर पर देश की पूरी सत्ता को अपने इशारे पर नचा सकते हैं।
Location : New Delhi
Published : 29 October 2026, 8:39 AM IST
Topics : Arab Parties Kingmaker Benjamin Netanyahu Israel Elections 2026 Israel Politics Middle East News