
शेख हसीना की पार्टी के सात नेताओं को फांसी की सजा (Img- Pinterest)
New Delhi: बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल-2 ने प्रतिबंधित अवामी लीग से जुड़े सात वरिष्ठ नेताओं को मानवता के खिलाफ अपराध के मामले में मौत की सजा सुनाई है। यह मामला 2024 में हुए छात्र आंदोलन और उसके दौरान भड़की हिंसा से जुड़ा है। तीन सदस्यीय पीठ की अध्यक्षता न्यायमूर्ति मोहम्मद नजरुल इस्लाम चौधरी ने की। सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा उनकी गैरमौजूदगी में चला।
मौत की सजा पाने वालों में अवामी लीग के महासचिव और पूर्व सड़क परिवहन मंत्री ओबैदुल कादेर, संयुक्त महासचिव एएफएम बहाउद्दीन नसीम और पूर्व सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री मोहम्मद अली अराफात शामिल हैं। इसके अलावा जुबो लीग के अध्यक्ष शेख फजले शम्स परश, महासचिव मैनुल हुसैन खान निखिल, बांग्लादेश छात्र लीग के अध्यक्ष साद्दाम हुसैन और महासचिव शेख वली आसिफ एनान को भी फांसी की सजा दी गई है। फैसले के समय सरकार की ओर से नियुक्त बचाव पक्ष के वकील अदालत में मौजूद थे।
यह मुकदमा 2024 के छात्र नेतृत्व वाले प्रदर्शनों से संबंधित है, जिन्हें बांग्लादेश में ‘जुलाई विद्रोह’ के नाम से भी जाना जाता है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, आरोपियों ने आंदोलन को दबाने के लिए निर्देश जारी किए, भड़काऊ बयान दिए और कथित तौर पर उन बैठकों में हिस्सा लिया जहां हिंसा की रणनीति पर चर्चा हुई। उन पर हथियारबंद हमलों, दमन और मीडिया को नियंत्रित करने के प्रयासों में भूमिका निभाने के आरोप भी लगाए गए।
छात्र आंदोलन के बीच 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद छोड़ दिया और बांग्लादेश से भारत आ गईं। इसके बाद उनकी पार्टी अवामी लीग के नेताओं, पूर्व मंत्रियों, सांसदों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ देशभर में बड़ी संख्या में मामले दर्ज किए गए। सात नेताओं के खिलाफ ट्रिब्यूनल ने 22 जनवरी को सात आरोप तय किए थे, जबकि मामले की सुनवाई 17 फरवरी से शुरू हुई थी।
इस मामले से जुड़े घटनाक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को भी नवंबर 2025 में मानवता के खिलाफ अपराध के आरोप में उनकी गैरमौजूदगी में मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। उनके साथ पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को भी दोषी ठहराया गया था। ट्रिब्यूनल ने हसीना को ‘सुपीरियर कमांड रिस्पॉन्सिबिलिटी’ के सिद्धांत के तहत जिम्मेदार माना था।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के अनुमान के अनुसार, 15 जुलाई से 5 अगस्त 2024 के बीच बांग्लादेश में छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी हिंसा में करीब 1,400 लोगों की मौत हुई थी। इसी हिंसा को लेकर तत्कालीन सरकार और उसके नेताओं की भूमिका जांच के दायरे में आई।
शेख हसीना को सुनाई गई मौत की सजा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठे थे। एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच समेत मानवाधिकार संगठनों ने मुकदमे की निष्पक्षता और कानूनी प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई थी। विशेष रूप से हसीना को अपनी पसंद का वकील उपलब्ध नहीं होने को लेकर सवाल उठाए गए थे।
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बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल की स्थापना 2010 में तत्कालीन शेख हसीना सरकार ने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान हुए मानवता के खिलाफ अपराधों की सुनवाई के लिए की थी। हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने ट्रिब्यूनल के कानून में संशोधन किया। इसके बाद राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े संगठनों के खिलाफ भी कार्रवाई का रास्ता खुला।
भारत में रह रहीं शेख हसीना ने हाल ही में दिसंबर में बांग्लादेश लौटने का इरादा जताया था। उन्होंने कहा था कि जेल जाने या मौत की सजा का खतरा भी उन्हें अपने देश लौटने से नहीं रोक सकता। नई दिल्ली में आयोजित एक वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने ऑडियो के जरिए मीडिया को संबोधित किया था। यह भारत आने के बाद उनकी पहली सार्वजनिक मीडिया बातचीत बताई गई थी।
Location : New Delhi
Published : 15 September 2026, 6:24 PM IST