
जवाहर बाग की काली शाम
Mathura: मथुरा की वह 2 जून 2016 की शाम आज भी रोंगटे खड़े कर देती है, जब 280 एकड़ में फैला जवाहर बाग अचानक हिंसा की आग में जल उठा था। यह कोई सामान्य टकराव नहीं था, बल्कि एक ऐसी खौफनाक घटना थी जिसमें पुलिस और कब्जाधारियों के बीच खुली जंग छिड़ गई थी। हर तरफ भगदड़, चीख-पुकार, आग और गोलियों की आवाजें थीं। इसी हिंसा में दो पुलिस अधिकारियों ने अपनी जान गंवा दी थी, जबकि कई कब्जाधारी भी मारे गए थे। आज इस घटना को दस साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन न्याय की प्रक्रिया अब भी अदालत में धीमी गति से आगे बढ़ रही है।
इस पूरे मामले की शुरुआत मार्च 2014 में मध्य प्रदेश के सागर जिले से हुई, जब स्वाधीन भारत विधिक सत्याग्रह संगठन के स्वयंभू अध्यक्ष रामवृक्ष यादव अपने समर्थकों के साथ दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे। बताया गया कि वह करीब 1500 लोगों के साथ निकले थे और प्रशासन से कुछ दिनों के लिए जवाहर बाग में ठहरने की अनुमति ली थी। लेकिन अनुमति के बाद भी वह वहां से नहीं गए और धीरे-धीरे पूरे 280 एकड़ क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। इसके बाद यहां एक समानांतर व्यवस्था खड़ी कर दी गई, जिससे मामला गंभीर हो गया और कोर्ट तक पहुंच गया।
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तत्कालीन एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी कई थानों की पुलिस फोर्स के साथ जवाहर बाग पहुंचे थे ताकि कब्जाधारियों को शांतिपूर्वक हटाया जा सके। लेकिन बातचीत की कोशिश के दौरान हालात अचानक बेकाबू हो गए। कब्जाधारियों ने पुलिस पर हमला कर दिया। देखते ही देखते हिंसा भड़क उठी और गोलियों की बौछार शुरू हो गई। इसी दौरान एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और फरह थाना प्रभारी संतोष कुमार यादव शहीद हो गए। जवाबी कार्रवाई और हिंसा में करीब 27 कब्जाधारी भी मारे गए। पूरा इलाका युद्धभूमि में बदल गया था।
जांच में सामने आया कि कब्जाधारियों ने जवाहर बाग के अंदर भारी मात्रा में असलहे, गैस सिलेंडर और हैंड ग्रेनेड जमा कर रखे थे। हिंसा के दौरान इनका जमकर इस्तेमाल हुआ। जगह-जगह आगजनी हुई और पूरे इलाके में दहशत फैल गई। घटना के बाद पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए 305 लोगों को गिरफ्तार किया था।
शुरुआत में इस मामले की जांच बेहद धीमी रही। बाद में मामला बढ़ने पर 22 मार्च 2017 को जांच सीबीआई को सौंप दी गई। लगभग साढ़े छह साल बाद, 7 दिसंबर 2022 को सीबीआई ने गाजियाबाद की विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल की। चार्जशीट में रामवृक्ष यादव समेत करीब 800 लोगों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास और बलवा जैसी गंभीर धाराएं लगाई गईं। फिलहाल मामला विशेष सीबीआई अदालत में लंबित है।
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इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल आज भी बना हुआ है कि क्या रामवृक्ष यादव वास्तव में मारा गया था या वह बच निकला था। शुरुआती जांच में मिले जले हुए शव के डीएनए मिलान को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। 2017 में आई शुरुआती फॉरेंसिक रिपोर्ट में डीएनए मैच नहीं हुआ, जिससे अफवाहें फैल गईं कि वह जिंदा है। हालांकि बाद में विस्तृत जांच और दोबारा डीएनए परीक्षण के बाद अप्रैल 2022 में सीबीआई ने स्पष्ट किया कि जवाहर बाग में मिला जला हुआ शव रामवृक्ष यादव का ही था।
आज जवाहर बाग पूरी तरह बदल चुका है। यहां नक्षत्र वाटिका, नवग्रह वाटिका और पंचवटी जैसी सुंदर संरचनाएं बनाई गई हैं। झूले, ओपन जिम और लंबा पाथवे इसे एक पर्यटन स्थल जैसा बनाते हैं। लेकिन इसके बावजूद कुछ निशान आज भी उस खौफनाक दिन की गवाही देते हैं। जले हुए पेड़, पुराने वाहन और कुछ क्षतिग्रस्त हिस्से आज भी उस हिंसा की याद दिलाते हैं, जिन्हें देखकर लोग सिहर उठते हैं।
1 जून 2016 को जवाहर बाग खाली कराने की योजना बनाई गई थी।
2 जून 2016 को पुलिस मौके पर पहुंची और हिंसा भड़क गई।
इसी दिन दो पुलिस अधिकारियों समेत 29 लोगों की मौत हो गई।
5 जून 2016 को पुलिस ने रामवृक्ष यादव के मारे जाने का दावा किया।
10 जून 2016 को न्यायिक आयोग का गठन किया गया।
मार्च 2017 में जांच सीबीआई को सौंपी गई।
2022 में सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल की और आज भी मामला अदालत में विचाराधीन है।
Location : Mathura
Published : 2 June 2026, 2:41 PM IST
Topics : cbi investigation Jawahar Bagh Incident Mathura Violence UP Crime History Uttar Pradesh News