
Muzaffarnagar: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की एक अदालत ने वर्ष 1994 के बहुचर्चित रामपुर तिराहा कांड से जुड़े फर्जी हथियार बरामदगी मामले में 32 साल बाद एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने तत्कालीन थाना प्रभारी (SHO) बृज किशोर और सिपाही अनिल व उमेश को दोषी करार देते हुए प्रत्येक को डेढ़-डेढ़ वर्ष के कारावास और पांच-पांच हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है। इस मामले में कुल चार आरोपी थे, जिनमें से एक आरोपी कमल किशोर की ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी है।
यह पूरा मामला 2 अक्टूबर 1994 का है, जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर उत्तराखंड संघर्ष समिति के बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी दिल्ली के लिए कूच कर रहे थे। इसी दौरान मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच भारी टकराव हुआ था, जिसे इतिहास में 'रामपुर तिराहा कांड' के नाम से जाना जाता है। इस घटना के बाद तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने आंदोलनकारियों को फंसाने के लिए उनसे फर्जी तरीके से अवैध हथियारों की रिकवरी दिखा दी थी।
मुजफ्फरनगर में बिजली संकट पर सियासत, FIR को लेकर गरमाया माहौल; जानिये पूरा विवाद
इस फर्जीवाड़े को उत्तराखंड संघर्ष समिति ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष एक रिट याचिका के माध्यम से चुनौती दी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने इसकी जांच सीबीआई (CBI) को सौंप दी। सीबीआई की जांच में यह सच सामने आया कि प्रदर्शनकारियों से हथियार बरामद होने का पूरा किस्सा पुलिस द्वारा फर्जी तरीके से गढ़ा गया था। इसके बाद सीबीआई ने आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। न्यायाधीश देवेंद्र फौजदार की अदालत ने सभी गवाहों और सबूतों को सुनने के बाद तीनों पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए यह फैसला सुनाया है, जिसे न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
Muzaffarnagar: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की एक अदालत ने वर्ष 1994 के बहुचर्चित रामपुर तिराहा कांड से जुड़े फर्जी हथियार बरामदगी मामले में 32 साल बाद एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने तत्कालीन थाना प्रभारी (SHO) बृज किशोर और सिपाही अनिल व उमेश को दोषी करार देते हुए प्रत्येक को डेढ़-डेढ़ वर्ष के कारावास और पांच-पांच हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है। इस मामले में कुल चार आरोपी थे, जिनमें से एक आरोपी कमल किशोर की ट्रायल के दौरान मौत हो चुकी है।
यह पूरा मामला 2 अक्टूबर 1994 का है, जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर उत्तराखंड संघर्ष समिति के बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी दिल्ली के लिए कूच कर रहे थे। इसी दौरान मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच भारी टकराव हुआ था, जिसे इतिहास में 'रामपुर तिराहा कांड' के नाम से जाना जाता है। इस घटना के बाद तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने आंदोलनकारियों को फंसाने के लिए उनसे फर्जी तरीके से अवैध हथियारों की रिकवरी दिखा दी थी।
मुजफ्फरनगर में बिजली संकट पर सियासत, FIR को लेकर गरमाया माहौल; जानिये पूरा विवाद
इस फर्जीवाड़े को उत्तराखंड संघर्ष समिति ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष एक रिट याचिका के माध्यम से चुनौती दी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने इसकी जांच सीबीआई (CBI) को सौंप दी। सीबीआई की जांच में यह सच सामने आया कि प्रदर्शनकारियों से हथियार बरामद होने का पूरा किस्सा पुलिस द्वारा फर्जी तरीके से गढ़ा गया था। इसके बाद सीबीआई ने आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। न्यायाधीश देवेंद्र फौजदार की अदालत ने सभी गवाहों और सबूतों को सुनने के बाद तीनों पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए यह फैसला सुनाया है, जिसे न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
Location : Muzaffarnagar
Published : 1 July 2026, 3:15 PM IST