देवघर जिले के मल्हारा गांव में होली रंग और पानी से नहीं, बल्कि फूलों की पंखुड़ियों से मनाई जाती है। जल संकट को देखते हुए ग्रामीणों ने पानी बचाने और सूखी होली का संदेश देने की पहल की है। गांव में गेंदे और गुलाब की खेती से किसानों की आय भी बढ़ी है। मल्हारा की यह अनोखी होली अब पर्यावरण संरक्षण की मिसाल बन चुकी है।

जहां देशभर में होली का नाम लेते ही रंग, गुलाल और पानी की पिचकारियां आंखों के सामने घूमने लगती हैं, वहीं देवघर जिले का मल्हारा गांव एक अलग ही तस्वीर पेश कर रहा है। यहां होली रंगों से नहीं, बल्कि फूलों की खुशबू और पंखुड़ियों की बरसात से मनाई जा रही है।
देवघर से सटे इस गांव की पहचान अब सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रही, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ जुड़ गई है। मल्हारा गांव के लोग वर्षों से फूलों की खेती करते आ रहे हैं। खेतों में गेंदे, गुलाब और अन्य पुष्पों की बहार रहती है। यही फूल अब होली के रंग बन चुके हैं।
ग्रामीण रमेश बताते हैं कि देवघर जिला ‘ड्राई जोन’ के रूप में जाना जाता है। गर्मी शुरू होते ही यहां पानी की किल्लत आम बात हो जाती है। पहले गांव में भी पानी और रंगों से होली खेली जाती थी, लेकिन जैसे-जैसे फूलों की खेती बढ़ी और लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरी, सोच भी बदली।
जहां देशभर में होली का नाम लेते ही रंग, गुलाल और पानी की पिचकारियां आंखों के सामने घूमने लगती हैं, वहीं देवघर जिले का मल्हारा गांव एक अलग ही तस्वीर पेश कर रहा है। यहां होली रंगों से नहीं, बल्कि फूलों की खुशबू और पंखुड़ियों की बरसात से मनाई जा रही है।
देवघर से सटे इस गांव की पहचान अब सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रही, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ जुड़ गई है। मल्हारा गांव के लोग वर्षों से फूलों की खेती करते आ रहे हैं। खेतों में गेंदे, गुलाब और अन्य पुष्पों की बहार रहती है। यही फूल अब होली के रंग बन चुके हैं।
ग्रामीण रमेश बताते हैं कि देवघर जिला ‘ड्राई जोन’ के रूप में जाना जाता है। गर्मी शुरू होते ही यहां पानी की किल्लत आम बात हो जाती है। पहले गांव में भी पानी और रंगों से होली खेली जाती थी, लेकिन जैसे-जैसे फूलों की खेती बढ़ी और लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरी, सोच भी बदली।