उत्तराखंड के बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत: यूपीसीएल का 5900 करोड़ का दावा खारिज, आयोग ने लगाई फटकार

उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने राज्य के करीब 27 लाख बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत देते हुए यूपीसीएल के 5,900 करोड़ रुपये के भारी-भरकम दावे को खारिज कर दिया है। आयोग ने केवल 389.33 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, जिससे वर्तमान में बिजली दरों में बढ़ोतरी का संकट टल गया है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 6 October 2026, 10:19 AM IST

Uttarakhand: उत्तराखंड के विद्युत उपभोक्ताओं के लिए एक बेहद राहत भरी खबर सामने आई है। उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने राज्य के करीब 27 लाख बिजली उपभोक्ताओं को बड़ा फायदा पहुंचाते हुए पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPCL) के भारी-भरकम 5,900 करोड़ रुपये के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। आयोग ने अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासनिक लापरवाही और लेटलतीफी का वित्तीय बोझ आम जनता पर नहीं डाला जा सकता। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद उपभोक्ताओं पर बिजली की दरें बढ़ने का संकट टल गया है।

क्या है पूरा मामला और ट्रांसफर स्कीम का विवाद?

यह पूरा प्रकरण उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 से जुड़ा हुआ है। नवंबर 2001 में केंद्र सरकार के निर्देशों के तहत उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड और नए बने उत्तराखंड पावर कारपोरेशन लिमिटेड के बीच संपत्तियों तथा देनदारियों का बंटवारा तय हुआ था। इसके बाद 12 अक्टूबर 2003 को दोनों निगमों के बीच संपत्ति ट्रांसफर स्कीम तैयार की गई।

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हालांकि, इस योजना की विडंबना यह रही कि इसे राज्य सरकार द्वारा औपचारिक रूप से अधिसूचित कराने में लगभग दो दशक का लंबा समय लग गया। आखिरकार, यह प्रक्रिया 8 मार्च 2022 को गजट में अधिसूचित हो पाई। इसी ट्रांसफर स्कीम के आधार पर यूपीसीएल ने संपत्तियों के मूल्यह्रास, इक्विटी पर रिटर्न, कार्यशील पूंजी पर ब्याज और सबसे बड़ा हिस्सा यानी वर्षों के विलंब पर लगने वाली लगभग 4,963.65 करोड़ रुपये की कैरिंग कॉस्ट को जोड़ते हुए कुल 5,900.01 करोड़ रुपये का अतिरिक्त एआरआर (ARR) दावा आयोग के सामने पेश किया था।

आयोग की कड़ी फटकार: जनता पर नहीं थोपा जाएगा लेटलतीफी का हर्जाना

नियामक आयोग के अध्यक्ष एमएल प्रसाद, विधि सदस्य अनुराग शर्मा और तकनीकी सदस्य प्रभात किशोर डिमरी की बेंच ने इस मामले पर गहन जनसुनवाई की। आयोग ने निगम और शासन के ढुलमुल रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। आयोग ने स्पष्ट कहा कि वर्ष 2003 में स्कीम बनने के बाद यूपीसीएल वर्षों तक फाइल दबाकर बैठा रहा। साल 2013 के बाद लगातार छह वर्षों तक कोई पत्राचार तक नहीं किया गया और वर्ष 2022 में अधिसूचना जारी होने के बाद भी मामला चार साल तक आयोग के पास नहीं लाया गया।

जांच में यह भी सामने आया कि यूपीसीएल के कुल 5,900 करोड़ रुपये के दावों में से वास्तविक दावा मात्र 936.37 करोड़ रुपये का ही था। शेष लगभग 4,963.65 करोड़ रुपये केवल वर्षों की देरी के कारण चक्रवृद्धि ब्याज यानी कैरिंग कॉस्ट के रूप में मांगे गए थे। इसके अलावा, केंद्र सरकार के उपक्रमों के बकाए 572 करोड़ रुपये को राज्य सरकार द्वारा शेयर पूंजी में बदलने के आधार पर मांगे गए रिटर्न को भी आयोग ने पूरी तरह खारिज कर दिया।

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आयोग ने किस मद में कितना दावा माना जायज?

नियामक आयोग ने अपनी समीक्षा के बाद केवल 389.33 करोड़ रुपये के दावे को ही वैध माना है, जिसका विवरण इस प्रकार है-

मूल्यह्रास (Depreciation): 288.70 करोड़ रुपये

रीजनेबल रिटर्न: 97.75 करोड़ रुपये

कार्यशील पूंजी पर ब्याज: 2.88 करोड़ रुपये

कैरिंग कॉस्ट: शून्य

अब आगे क्या होगा? सरकार या टैरिफ के जरिए होगा समाधान

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि वर्तमान में बिजली की दरों में किसी भी प्रकार की बढ़ोतरी नहीं की जा रही है। स्वीकृत की गई 389.33 करोड़ रुपये की राशि के समाधान के लिए आयोग ने दो विकल्प सुझाए हैं। पहला यह कि राज्य सरकार चाहे तो इस राशि को यूपीसीएल की ओर से सरकार को देय देनदारियों के साथ समायोजित करके निपटा ले। दूसरा विकल्प यह है कि यदि ऐसा नहीं होता है, तो इस राशि को आगामी टैरिफ प्रस्तावों में चरणबद्ध तरीके से शामिल किया जाएगा, ताकि जनता की जेब पर एकमुश्त आर्थिक बोझ न पड़े। इस प्रकार, इस फैसले ने उत्तराखंड के लाखों बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत दी है।

Location :  Uttarakhand

Published :  6 October 2026, 10:19 AM IST