
हाईकोर्ट ने खाकी को पढ़ाया संविधान का पाठ (Img- Pinterest)
Nainital: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक नागरिक की बिना वजह गिरफ्तारी पर सख्त रुख अपनाते हुए पुलिस महकमे को खरी-खोटी सुनाई है। 62 वर्षीय प्रभात ध्यानी को ऋषिकेश रेलवे स्टेशन पर रोके जाने के मामले में कोर्ट ने तल्ख सवाल किया कि क्या पुलिस सरकार की छवि चमकाने के लिए काम कर रही है या आम जनता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए?
उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी (UPP) के अध्यक्ष प्रभात ध्यानी नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ियों के खिलाफ छात्रों के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने दिल्ली जा रहे थे। ऋषिकेश स्टेशन पर पुलिस ने उन्हें रोककर हिरासत में ले लिया।
इसके खिलाफ यूपीपी सचिव लाल मणि ने हाईकोर्ट में 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर की। जवाब में राज्य के वकील ने कहा कि उन्हें 24 घंटे के अंदर रिहा कर दिया गया था, लेकिन कोर्ट ने इस ढर्रे को गंभीर अराजकता माना।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नरेश पांडे को नहीं दी अंतरिम राहत, अग्रिम जमानत पर सुनवाई 9 जुलाई तक टली
सुनवाई के दौरान जब सरकारी वकील ने BNSS की धारा 163 (शांति भंग रोकने का अधिकार) का हवाला दिया, तो जस्टिस रवींद्र मैथानी और जस्टिस सिद्धार्थ साह की बेंच ने तीखा सवाल दागा। कोर्ट ने पूछा कि जब धारा 163 का आदेश दिल्ली में लागू था, तो उत्तराखंड पुलिस ने राज्य की सीमा में किसी को किस अधिकार से रोका? क्या शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना कोई संज्ञेय अपराध बन गया है?
उत्तराखंड हाईकोर्ट बना देश का ऐसा पहला हाईकोर्ट, जिसने जजों की शिकायतों का पिटारा खोला
पुलिस की 'डेली डायरी' की जांच में यह हैरान करने वाली बात सामने आई कि ध्यानी के प्रदर्शन में शामिल होने से सरकार की छवि खराब हो सकती थी। अदालत ने इसे पुलिसिया गुंडागर्दी करार देते हुए निर्देश दिया कि ऋषिकेश में ध्यानी को जबरन हिरासत में लेने वाले पुलिस अधिकारी को मामले में व्यक्तिगत रूप से पक्षकार (पार्टी) बनाया जाए।
Location : Nainital
Published : 22 July 2026, 10:43 AM IST