नैनीताल की शांत वादियों में ब्रिटिशकाल का इतिहास आज भी सांस लेता है और इसी इतिहास की एक महत्वपूर्ण निशानी है चाफी क्षेत्र में स्थित झूला पुल। करीब सवा सौ साल पुराना यह पुल औपनिवेशिक दौर की इंजीनियरिंग का ऐसा नमूना है, जो वक्त की तमाम चुनौतियों के बावजूद…

पहाड़ियों में बसा ब्रिटिशकाल का अनमोल धरोहर
Nainital: नैनीताल की शांत वादियों में ब्रिटिशकाल का इतिहास आज भी सांस लेता है और इसी इतिहास की एक महत्वपूर्ण निशानी है चाफी क्षेत्र में स्थित झूला पुल। करीब सवा सौ साल पुराना यह पुल औपनिवेशिक दौर की इंजीनियरिंग का ऐसा नमूना है, जो वक्त की तमाम चुनौतियों के बावजूद आज भी मजबूती के साथ खड़ा है।
पहाड़ी रास्तों पर आवाजाही
अंग्रेज शासनकाल में नैनीताल ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करता था और इसी दौरान कई संरचनाएं बनाई गईं, जिनमें झूला पुल विशेष रूप से उल्लेखनीय है। नैनीताल से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित यह पुल उस समय का मुख्य पैदल मार्ग माना जाता था। सहरफाटक और चाफी क्षेत्र को जोड़ने के लिए इसे तैयार किया गया था, जब यहां सड़कें नहीं थीं और पहाड़ी रास्तों पर आवाजाही इसी पुल के सहारे होती थी।
प्राकृतिक पत्थरों से बनाया गया पुल
जानकारी के मुताबिक, यह पुल पूरी तरह प्राकृतिक पत्थरों से बनाया गया, जिनको बिना तराशे सीधे उपयोग में लिया गया था। पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए उस दौर में चूने और उड़द की दाल वाले मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे संरचना अधिक टिकाऊ बनती थी।
ब्रिटिशकालीन विरासत की श्रेणी में विशेष स्थान
कुछ दशक पहले पुल के निर्माण वर्ष का उल्लेख करने वाला पत्थर टूट जाने के कारण इसकी सटीक तिथि अब उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसका पुरातन स्वरूप और कारीगरी इसे ब्रिटिशकालीन विरासत की श्रेणी में विशेष स्थान दिलाते हैं। समय बीतने के साथ इसका रखरखाव कम हुआ है और आज भी इस पर आने जाने वाले पर्यटकों द्वारा मोटरसाइकिल या स्कूटी ले जाना इसकी संरचना पर खतरा पैदा करता है।
पथरी का मामूली ऑपरेशन और फिर सीधे मौत की खबर, आखिर क्यों सील करना पड़ा नामी अस्पताल का ओटी?
औपनिवेशिक इंजीनियरिंग की श्रेष्ठता का जीवंत प्रमाण
मिली जानकारी के मुताबिक, इतिहासकारों का मानना है कि यह पुल औपनिवेशिक इंजीनियरिंग की श्रेष्ठता का जीवंत प्रमाण है और इसकी सुरक्षा जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी पहाड़ों के इस अनमोल इतिहास को महसूस कर सकें।