
नैनीताल की नैना देवी मंदिर (Img: Dynamite News)
Nainital: झीलों की नगरी नैनीताल की पहचान सिर्फ उसकी खूबसूरत वादियों और नैनी झील से नहीं है। इस शहर के हृदय में विराजमान मां नैना देवी मंदिर आस्था, पौराणिक मान्यताओं और इतिहास का ऐसा संगम है, जिसकी कहानी विनाश के बाद फिर खड़े हुए विश्वास की कहानी भी कहती है। नैनी झील के उत्तरी किनारे पर स्थित यह मंदिर देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे। सृष्टि को संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंगों को अलग कर दिया। मान्यता है कि माता सती की बाईं आंख इसी स्थान पर गिरी थी। कहा जाता है कि माता का नैन गिरने के बाद यहां एक झील का निर्माण हुआ, जिसे आगे चलकर नैनी झील के नाम से जाना गया। इसी मान्यता के कारण यहां मां नैना देवी की पूजा होती है। मंदिर के गर्भगृह में देवी का स्वरूप दो नेत्रों के रूप में पूजित है।
मां नैना देवी मंदिर के आधुनिक इतिहास की बात करें तो 1842 में मोतीराम शाह द्वारा यहां मंदिर का निर्माण कराए जाने का उल्लेख मिलता है। धीरे-धीरे यह मंदिर कुमाऊं क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया और नैनीताल आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
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नैना देवी मंदिर के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय 18 सितंबर 1880 से जुड़ा है। इस दिन नैनीताल में भीषण भूस्खलन हुआ। शेर-का-डांडा पहाड़ी का बड़ा हिस्सा खिसकने से शहर में भारी तबाही मची। इस प्राकृतिक आपदा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और नैनीताल का एक बड़ा हिस्सा मलबे की चपेट में आ गया। इसी विनाशकारी भूस्खलन में पुराना नैना देवी मंदिर भी पूरी तरह नष्ट हो गया। लेकिन मंदिर के ढहने के साथ लोगों की आस्था नहीं टूटी।
आपदा के बाद स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने मंदिर के पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया। वर्षों की मेहनत के बाद 1883 में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। इस तरह जिस मंदिर ने प्राकृतिक आपदा में अपना अस्तित्व खो दिया था, वह लोगों की आस्था और सामूहिक प्रयास से फिर झील के किनारे खड़ा हो गया। स्थानीय मान्यता है कि मां नैना देवी की कृपा नैनीताल पर बनी रही और इसी विश्वास ने लोगों को आपदा के बाद दोबारा खड़े होने का हौसला दिया।
आज मंदिर में मां नैना देवी के दो नेत्र स्वरूप की पूजा की जाती है। उनके साथ मंदिर में मां काली और भगवान गणेश भी विराजमान हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर बने पत्थर के सिंह इसकी धार्मिक और स्थापत्य सुंदरता को और खास बनाते हैं।
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आज नैनीताल आने वाले पर्यटक जब नैनी झील के किनारे मां नैना देवी मंदिर के दर्शन करते हैं, तो उनके सामने सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं होता। यह स्थान पौराणिक मान्यता, 1842 के मंदिर निर्माण, 1880 की विनाशकारी आपदा और 1883 में हुए पुनर्निर्माण की पूरी कहानी अपने भीतर समेटे हुए है। नैना देवी मंदिर की यही खासियत इसे नैनीताल की पहचान का अभिन्न हिस्सा बनाती है। यहां झील की खूबसूरती के साथ आस्था की गहराई भी महसूस होती है। शायद यही वजह है कि दशकों और सदियों के बदलाव के बावजूद मां नैना देवी के दरबार में श्रद्धा का सिलसिला आज भी कायम है।
Location : Nainital
Published : 26 August 2026, 11:29 AM IST