उत्तराखंड हाई कोर्ट का सख्त संदेश: बच्चे का भरण-पोषण सर्वोपरि, जिम्मेदारी से बच नहीं सकता पिता

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण से कर्ज या मां की आय का हवाला देकर बच नहीं सकता। कोर्ट ने 8,000 रुपये मासिक देने का आदेश बरकरार रखते हुए पिता की याचिका खारिज कर दी।

Post Published By: सौम्या सिंह
Updated : 21 April 2026, 3:43 PM IST

Nainital: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पिता अपने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से किसी भी हाल में बच नहीं सकता। कोर्ट ने कहा कि मां की आय या पिता पर मौजूद कर्ज इस वैधानिक दायित्व को कम नहीं करते। बच्चे का अधिकार सर्वोपरि है और इसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

परिवार न्यायालय के आदेश को दी मंजूरी

न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकल पीठ ने रुड़की परिवार न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पिता को अपने नाबालिग बच्चे के लिए प्रति माह 8,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने माना कि यह राशि परिस्थितियों के अनुसार उचित है।

यह मामला दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दायर याचिका से जुड़ा है। बच्चे की मां ने अदालत से भरण-पोषण की मांग की थी, जिसे परिवार न्यायालय ने स्वीकार करते हुए पिता को आवेदन की तारीख से ही भुगतान करने का आदेश दिया था।

पिता ने हाईकोर्ट में दी थी चुनौती

पिता ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। उसका कहना था कि वह और उसकी पत्नी दोनों सरकारी सेवा में हैं वह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में और पत्नी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में कार्यरत है। इसलिए पूरे खर्च का बोझ केवल उसी पर डालना उचित नहीं है।

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याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि उसकी आय का बड़ा हिस्सा कर्ज की किश्तों, माता-पिता और अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियों में खर्च होता है। ऐसे में उस पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना न्यायसंगत नहीं है।

कोर्ट ने पिता की दलीलों को किया खारिज

कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि कर्ज और निजी खर्च स्वेच्छा से लिए गए दायित्व हैं जो बच्चे के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकते। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि मां की आय को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके आधार पर पिता अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।

अदालत ने कहा कि धारा 125 एक सामाजिक न्याय का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य अभाव और दरिद्रता को रोकना है। इसलिए इसकी व्याख्या हमेशा आश्रितों, विशेषकर बच्चों के हित में की जानी चाहिए। नाबालिग को माता-पिता की स्थिति के अनुरूप जीवन स्तर मिलना चाहिए।

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पितृत्व पर कोई विवाद नहीं

कोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में बच्चे के पितृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं है, जिससे पिता का दायित्व स्पष्ट रूप से स्थापित होता है। ऐसे में भरण-पोषण देने से बचने का कोई आधार नहीं बनता। तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने पिता की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और परिवार न्यायालय के आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि 8,000 रुपये की राशि न तो अधिक है और न ही अनुचित।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अंतरिम भरण-पोषण है और अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा। इसके बावजूद यह फैसला एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि बच्चों के अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।

Location :  Nainital

Published :  21 April 2026, 3:43 PM IST