शंकराचार्य पद को लेकर जारी विवाद पर अखिलेश यादव ने “क्षमा वीरस्य भूषणम्” कहते हुए इशारों में सरकार को माफी की सलाह दी है। प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण के नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आठ पन्नों का स्पष्टीकरण भेजा है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में बोले अखिलेश यादव (Img: Google)
Prayagraj: ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पदवी को लेकर उठा विवाद अब धार्मिक दायरे से निकलकर राजनीतिक गलियारों तक पहुंच गया है। प्रयागराज माघ मेला में हुए टकराव और इसके बाद मेला प्रशासन द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर दिए गए अपने बयान से इस बहस को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए सरकार को इशारों में माफी की सलाह दी और संस्कृत उक्ति “क्षमा वीरस्य भूषणम्” का उल्लेख किया।
अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि अगर किसी और की गलती से भी कोई व्यक्ति अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हो, तो भी क्षमा मांगने से कोई छोटा नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि महान लोग यह समझते हैं कि गलत आचरण के पीछे किसी का व्यक्तिगत स्वार्थ हो सकता है, इसलिए वे बड़े मन से माफी स्वीकार कर आशीर्वाद देते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने लिखा, “इसीलिए हमारी संस्कृति में कहा गया है: क्षमा वीरस्य भूषणम्।”
इससे पहले अखिलेश यादव ने एक और पोस्ट में लिखा था कि “जगद्गुरु का स्थान विश्वगुरु से भी ऊंचा होता है।” उन्होंने धार्मिक परंपराओं की गरिमा की बात करते हुए कहा कि इहलोक का शासक भी जिनको प्रणाम करता है, उनके सम्मान पर सवाल उठाना उचित नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने शंकराचार्य से प्रमाणपत्र मांगने के मुद्दे पर भी तीखा हमला बोला और कहा कि पहले सर्टिफिकेट मांगने वाले खुद अपना प्रमाणपत्र दिखाएं।
प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण ने मंगलवार को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजकर उनके शंकराचार्य के रूप में प्रस्तुतीकरण पर सवाल उठाया था। प्रशासन का तर्क था कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसके जवाब में बुधवार को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से सीनियर अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा के माध्यम से आठ पन्नों का विस्तृत स्पष्टीकरण भेजा गया।
जब उनकी टीम सेक्टर-4 स्थित मेला प्राधिकरण कार्यालय पहुंची, तो वहां कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं मिला। काफी इंतजार के बाद अनुयायियों ने विरोध जताते हुए उस जवाब को कार्यालय के मुख्य द्वार पर ही चस्पा कर दिया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से भेजे गए जवाब में नोटिस को अपमानजनक और असंवैधानिक बताया गया है। अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा ने कहा कि शंकराचार्य जैसे प्रतिष्ठित धार्मिक पद पर प्रशासनिक हस्तक्षेप करोड़ों हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुंचाने जैसा है। जवाब में कहा गया कि धार्मिक पदों पर इस तरह की कार्रवाई से सामाजिक और धार्मिक तनाव बढ़ता है।
कानूनी पक्ष रखते हुए जवाब में कहा गया कि प्रशासन ने केवल 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का उल्लेख किया है, जबकि इससे पहले 21 सितंबर 2022 का आदेश भी मौजूद है, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य के रूप में संबोधित किया गया था। वकीलों का दावा है कि तथ्यों को अधूरा प्रस्तुत कर अनावश्यक विवाद खड़ा किया गया है।