‘कायर जज कहलाने से बेहतर है कि मैं मर जाऊं’, 5 महीने में 23वीं फांसी की सजा सुनाने वाले Judge Ravi Kumar Diwakar का बड़ा बयान

मुजफ्फरनगर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने महज पांच महीनों में 23वां मृत्युदंड सुनाने के बाद न्याय व्यवस्था और माफिया के दबाव पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 9 September 2026, 2:08 PM IST

Muzaffarnagar: मुजफ्फरनगर के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर चर्चा में हैं। सिर्फ पांच महीनों में 23वीं बार मौत की सज़ा सुनाने के बाद जज दिवाकर ने अब माफिया और आपराधिक तत्वों के दबाव को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। सोमवार को उन्होंने मोहम्मद नदीम को अपनी पत्नी शहजादी की हत्या का दोषी पाते हुए मौत की सजा सुनाई; यह मामला लगभग आठ साल पुराना है और इसमें दहेज से जुड़ी हत्या का मामला शामिल था। इस अपराध को बेहद क्रूर और बर्बर बताते हुए अदालत ने इसे "दुर्लभतम मामलों" की श्रेणी में रखा।

पत्नी पर केरोसिन डालकर आग लगाने का आरोप

यह मामला जुलाई 2018 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, नदीम ने अपनी पत्नी शहजादी पर केरोसिन डाला और उसे आग लगा दी। बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। मुकदमे के दौरान कई गवाह जिनमें मृतका के माता-पिता भी शामिल थे अपने बयानों से पलट गए। उन्होंने दहेज के लिए उत्पीड़न और हत्या के आरोपों से इनकार किया; हालांकि अदालत ने शहजादी के मरणासन्न बयान को अहम सबूत मानते हुए आरोपी को दोषी ठहराया।

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फैसले के बाद माफिया के प्रभाव पर सवाल

सजा सुनाने के बाद जज रवि कुमार दिवाकर ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति और न्यायिक प्रक्रिया पर माफिया के कथित प्रभाव को लेकर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि बाहरी दबाव के कारण अक्सर आपराधिक मामलों को लंबा खींचा जाता है या उन्हें वापस लेने की कोशिश की जाती है। ऐसे हालात में जजों को बिना किसी डर के अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

माफिया का डर न्यायपालिका में भरोसे को कम करेगा

जज दिवाकर ने कहा कि हाल की कुछ घटनाओं ने उन्हें बहुत परेशान किया है। उन्होंने दावा किया कि उन्हें कुछ मामलों को वापस लेने के कारणों की जानकारी है, लेकिन अपने पद की गरिमा का सम्मान करते हुए वे इस समय उनका खुलासा नहीं करना चाहते। उन्होंने बताया कि उन्हें कुछ मामलों की कार्यवाही को लेकर धमकी भरे संदेश मिले थे। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि वे डर के कारण अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा, "मेरे माता-पिता ने मुझे सिर्फ ईश्वर से डरना सिखाया है। अगर मैं माफिया से डरने लगूं तो इससे न्यायपालिका में जनता का भरोसा कम हो जाएगा।"

कायर जज कहलाने से बेहतर है मर जाना

जस्टिस दिवाकर ने कहा कि वह अपने सिद्धांतों के अनुसार काम करना जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि अगर ऐसी स्थिति आती है जहां वह निष्पक्ष रूप से काम नहीं कर सकते तो वह अपने पद से हटना पसंद करेंगे। उन्होंने कहा, "मेरे लिए कायर जज कहलाने से बेहतर है मर जाना।"

ज्ञानवापी मामले के बाद चर्चा में आए दिवाकर

रवि कुमार दिवाकर पहले भी कई अहम मामलों को लेकर चर्चा में रहे हैं। वाराणसी में अपनी पोस्टिंग के दौरान, उन्होंने ज्ञानवापी परिसर के सर्वे को लेकर एक अहम आदेश जारी किया था। उन्होंने दावा किया कि उस मामले के बाद उन्हें और उनके परिवार को धमकियां मिलीं। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिली और बाद में उन्हें दी गई सुरक्षा कम कर दी गई।

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न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर अहम सवाल

अपने बयान में जज दिवाकर ने उन घटनाओं का भी जिक्र किया जिनमें न्यायिक अधिकारियों को निशाना बनाया गया था। उन्होंने कहा कि गंभीर आपराधिक मामलों में फैसला सुनाने वाले जजों को अक्सर दबाव और खतरे वाली स्थितियों का सामना करना पड़ता है। पुरानी घटनाओं का हवाला देते हुए उन्होंने जोर दिया कि न्यायपालिका की आजादी और न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सबसे जरूरी है।

23वीं मौत की सजा के साथ उठा एक अहम सवाल

रवि कुमार दिवाकर के बयान पर उनकी सुनाई गई 23वीं मौत की सजा से ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। उनकी बातों ने न्यायिक व्यवस्था के लिए एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है: क्या जज बिना किसी डर या दबाव के फैसला सुना पाते हैं?

Location :  Muzaffarnagar

Published :  9 September 2026, 2:08 PM IST