गजब फैसला: पति ने 15 रुपये में पत्नी को बेचा, ब्रिटिश कोर्ट ने भी लगा दी थी मुहर

इलाहाबाद हाईकोर्ट के विधि संग्रहालय में 1809 के एक ऐसे ऐतिहासिक फैसले का दस्तावेज सुरक्षित है, जिसमें पति द्वारा पत्नी को 15 रुपये में बेचने के मामले पर ब्रिटिश कोर्ट ने मुहर लगाई थी। यह मामला उस दौर की सामाजिक सोच और न्याय व्यवस्था को दर्शाता है।

Post Published By: Mayank Tawer
Updated : 24 August 2026, 4:04 PM IST

Lucknow: इतिहास में कई ऐसे फैसले दर्ज हैं, जिन्हें पढ़कर आज भी हैरानी होती है। ऐसा ही एक मामला करीब 200 साल पुराना है, जब एक पति ने अपनी पत्नी को महज 15 रुपये में बेच दिया था और उस समय की ब्रिटिश अदालत ने इस सौदे को सही ठहरा दिया था। साल 1809 का यह अनोखा न्यायिक फैसला आज भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के विधि संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।

पत्नी को बेचने का मामला पहुंचा था अदालत

यह मामला 19वीं शताब्दी की शुरुआत का बताया जाता है। उस समय बंगाल में देवमती नाम की एक महिला को उसके पति ने किसी दूसरे व्यक्ति के हाथों 15 रुपये में बेच दिया था। जब यह बात महिला की मां को पता चली तो उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कोर्ट से अपनी बेटी को वापस दिलाने की गुहार लगाई और इस पूरे सौदे को चुनौती दी।

तीन जजों की बेंच ने की थी सुनवाई

मामले की सुनवाई जज जॉन हर्बर्ट हॉर्निक्टन, जेम्स और स्टीवर्ट की बेंच ने की थी। सुनवाई के दौरान महिला का बयान दर्ज किया गया। बताया जाता है कि महिला ने कोर्ट में कहा था कि यह सौदा उसकी सहमति से हुआ था। इसके बाद अदालत ने धर्मगुरुओं से इस मामले पर धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं के आधार पर राय मांगी। धर्मगुरुओं ने कोर्ट को बताया कि महिला की सहमति से हुआ यह सौदा मान्य माना जा सकता है। इसके बाद अदालत ने इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुरक्षित है दस्तावेज

इलाहाबाद हाईकोर्ट का विधि संग्रहालय ऐतिहासिक न्यायिक दस्तावेजों और दुर्लभ सामग्रियों के लिए जाना जाता है। इसी संग्रहालय में पत्नी की बिक्री से जुड़े इस फैसले का रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखा गया है।न्यायिक अधिकारियों के मुताबिक उस दौर में ब्रिटिश अदालतें कई सामाजिक और दीवानी मामलों में स्थानीय परंपराओं और जूरी की राय को काफी महत्व देती थीं। यही वजह थी कि इस मामले में भी धर्मगुरुओं की सलाह को आधार बनाया गया।

कोर्ट नंबर 21 में आज भी मौजूद है जूरी बेंच

इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोर्ट नंबर 21 में आज भी जूरी के बैठने की जगह देखी जा सकती है। आजादी के बाद भी कुछ समय तक भारत में जूरी व्यवस्था जारी रही थी। इस व्यवस्था में समाज के प्रतिष्ठित लोग सुनवाई के दौरान मौजूद रहते थे और मामले के तथ्यों पर अपनी राय कोर्ट के सामने रखते थे।

नानावटी केस के बाद खत्म हुई जूरी व्यवस्था

अपर महाधिवक्ता और भारत सरकार के पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अशोक मेहता के मुताबिक जूरी व्यवस्था में जूरी सदस्य तथ्यों के आधार पर राय देते थे, जबकि अदालत कानून के अनुसार फैसला करती थी। उन्होंने बताया कि 1956-57 में चर्चित केएम नानावटी केस के बाद भारत में जूरी व्यवस्था खत्म कर दी गई। इस मामले में नौसेना अधिकारी केएम नानावटी ने अपनी पत्नी सिल्विया के प्रेमी की हत्या कर दी थी। जूरी ने नानावटी को निर्दोष माना था, लेकिन बाद में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया।

बदल चुका है समाज और कानून

महिला को संपत्ति की तरह देखने वाला यह पुराना फैसला उस दौर की सामाजिक सोच को दिखाता है। आज भारत का संविधान महिला और पुरुष को समान अधिकार देता है। अशोक मेहता के अनुसार आजादी के बाद भारत में समानता और अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण मिला, जबकि उस समय महिलाओं की स्थिति पूरी तरह अलग थी।

Location :  Lucknow

Published :  24 August 2026, 4:04 PM IST