
सावन के महाशिवरात्री की खासियत (Img: AI Generated Image)
New Delhi: हिंदू धर्म में भगवान शिव की उपासना के लिए शिवरात्रि का पर्व बेहद पवित्र माना जाता है। वैसे तो हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि आती है और फाल्गुन मास में महाशिवरात्रि मनाई जाती है, लेकिन सावन महीने की शिवरात्रि (Sawan Shivratri) का अपना एक अलग और विशेष धार्मिक महत्व है।
इस वर्ष सावन शिवरात्रि का महापर्व 11 अगस्त 2026 (मंगलवार) को मनाया जा रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सावन के महीने में ही शिवरात्रि इतनी धूमधाम से क्यों मनाई जाती है और इस दिन जलाभिषेक का इतना बड़ा महत्व क्यों है? आइए जानते हैं इसके पीछे के 4 मुख्य धार्मिक, पौराणिक और वैज्ञानिक कारण।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सावन के पवित्र महीने में ही देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन किया गया था। इस मंथन के दौरान जब अत्यंत जहरीला 'हलाहल' विष निकला, तो उसकी ज्वाला से पूरी सृष्टि तपने लगी। ब्रह्मांड को विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने स्वयं उस विष का पान कर लिया।
महादेव ने विष को अपने गले से नीचे नहीं उतरने दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। विष के तीव्र प्रभाव से शिव जी के शरीर में अत्यधिक जलन और ताप बढ़ने लगा। तब सभी देवताओं ने उनके शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए उन पर निरंतर शीतल जल और गंगाजल अर्पित किया। यही कारण है कि सावन शिवरात्रि पर शिवलिंग पर जल चढ़ाने और कांवड़ यात्रा लाकर जलाभिषेक करने की विशेष परंपरा चली आ रही है।
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सावन शिवरात्रि का दिन प्रेम, तपस्या और समर्पण का प्रतीक भी माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। सावन मास में ही महादेव ने माता पार्वती की निश्छल भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया था। इसी कारण सावन शिवरात्रि का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य लाने वाला और कुंवारी कन्याओं के लिए मनचाहा वर दिलाने वाला माना जाता है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, आषाढ़ मास की देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान ब्रह्मांड के संचालन और सृष्टि के पालन का संपूर्ण कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। ऐसी मान्यता है कि सावन के पूरे महीने में महादेव अपनी ससुराल यानी पृथ्वी लोक पर ही निवास करते हैं। जब स्वयं सृष्टि के स्वामी पृथ्वी पर उपस्थित हों, तब सावन शिवरात्रि के दिन की गई पूजा, व्रत और मंत्र जाप का फल वर्ष की अन्य शिवरात्रियों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है।
सावन का महीना वर्षा ऋतु का मध्य समय होता है, जब चारों ओर नई हरियाली और ऊर्जा का संचार होता है।
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शरीर और प्रकृति का संतुलन: आयुर्वेद और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, मानसून के इस मौसम में वातावरण में नमी और बीमारियों का प्रकोप बढ़ता है। ऐसे समय में सात्विक जीवन शैली अपनाना, उपवास (व्रत) रखना और भगवान शिव को शीतल जल व बेलपत्र अर्पित करना मानसिक शांति के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बेहतर बनाता है।
शिवरात्रि तिथि: मंगलवार, 11 अगस्त 2026
चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 11 अगस्त, सुबह 04:54 बजे
चतुर्दशी तिथि समाप्त: 12 अगस्त, रात 01:52 बजे
निशिता काल (मध्यरात्रि पूजा): 12 अगस्त, रात 12:05 AM से 12:48 AM तक
Location : New Delhi
Published : 7 August 2026, 3:16 PM IST