Dussehra 2026: रावण के दस सिर कैसे आए? जानिए ब्रह्मा जी के वरदान से जुड़ी धार्मिक कथा

Dussehra 2026: रावण को दस सिर कैसे मिले और उसे दशानन क्यों कहा जाता है? जानिए ब्रह्मा जी के वरदान, कठोर तपस्या, नाभि में अमृत की कथा और रावण के दस सिरों के प्रतीकात्मक अर्थ। दशहरे पर समझें बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश।

Post Published By: Tanya Chand
Updated : 20 October 2026, 1:12 PM IST
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New Delhi: दशहरे पर हर साल रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रावण को दस सिर कैसे मिले और उसे दशानन क्यों कहा जाता है? धार्मिक ग्रंथों में रावण के कठोर तप और ब्रह्मा जी से मिले वरदान का वर्णन मिलता है।

मान्यता के अनुसार, रावण ने हजारों वर्षों तक तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया था। उसके दस सिरों को लेकर धार्मिक कथाओं के साथ-साथ प्रतीकात्मक अर्थ भी बताए जाते हैं।

रावण ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए किया कठोर तप

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में वर्णित कथा के अनुसार, रावण ने गोकर्ण तीर्थ में ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। वह हर एक हजार साल की तपस्या पूरी होने पर अपना एक सिर काटकर अग्नि में अर्पित करता था। कथा के मुताबिक, हर बार उसका सिर दोबारा प्राप्त हो जाता था। इस तरह उसने नौ हजार साल तक नौ सिर अग्नि में अर्पित किए।

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दसवां सिर काटने से पहले प्रकट हुए ब्रह्मा जी

धार्मिक कथा के अनुसार, जब दस हजार साल की तपस्या पूरी होने वाली थी और रावण अपना दसवां सिर काटने जा रहा था, तभी ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उन्होंने रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे दस सिर प्रदान किए। इसके साथ ही उसे नाभि में अमृत होने का वरदान भी मिला। दस सिर होने के कारण रावण को दशानन कहा जाने लगा। यह प्रसंग श्रीरामचरितमानस और श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित कथाओं से भी जुड़ा है।

रावण की नाभि में अमृत का क्या था रहस्य?

रामायण की प्रचलित कथा के अनुसार, लंका युद्ध के दौरान विभीषण ने भगवान राम को रावण की नाभि में अमृत होने की बात बताई थी। इसके बाद भगवान राम ने रावण की नाभि पर बाण चलाया। मान्यता है कि इससे उसकी मृत्यु का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह प्रसंग रावण के वरदान और उसके वध से जुड़ी धार्मिक कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

रावण के दस सिरों का क्या है प्रतीकात्मक अर्थ?

रावण के दस सिरों को केवल उसकी शक्ति का प्रतीक नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें मनुष्य के भीतर मौजूद बुराइयों से भी जोड़कर देखा जाता है। अलग-अलग धार्मिक और लोकप्रिय व्याख्याओं में इनके अर्थ कुछ अलग मिलते हैं। आम तौर पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, ईर्ष्या, अहंकार, चंचलता, गलत बुद्धि और नकारात्मक सोच को इनसे जोड़ा जाता है।

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दशहरे पर दस बुराइयों को छोड़ने का संदेश

दशहरा केवल रावण के पुतले का दहन करने का पर्व नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है। रावण विद्वान होने के बावजूद अपने अहंकार और गलत फैसलों के कारण विनाश की ओर बढ़ा।

इसलिए उसके दस सिरों की प्रतीकात्मक व्याख्या लोगों को अपने भीतर की बुराइयों को पहचानने और उन्हें दूर करने की प्रेरणा देती है। भगवान राम के आदर्शों को अपनाकर सत्य, संयम और सदाचार के रास्ते पर चलना ही इस पर्व का प्रमुख संदेश माना जाता है।

Location :  New Delhi

Published :  20 October 2026, 1:12 PM IST

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