देश आजाद हुआ, लेकिन क्या हर महिला आजाद हुई? मथुरा से भंवरी देवी तक… अपने ही समाज से लड़ती रहीं ये महिलाएं

15 अगस्त को देश अपनी आजादी का जश्न मनाता है, लेकिन महिलाओं की सामाजिक आजादी का सवाल आज भी कायम है। मथुरा, भंवरी देवी और शाह बानो जैसी महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष

Post Published By: Poonam Rajput
Updated : 14 August 2026, 3:15 PM IST

New Delhi: 15 अगस्त को पूरा देश आजादी का जश्न मनाता है। तिरंगा लहराता है, देशभक्ति के गीत गूंजते हैं और उन लोगों को याद किया जाता है जिन्होंने देश को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने के लिए संघर्ष किया। लेकिन इसी आजाद देश की कहानी का एक दूसरा पहलू भी है।

देश को आजादी मिले 79 साल हो चुके हैं, संविधान महिलाओं को बराबरी का अधिकार देता है, कानून उन्हें सुरक्षा और स्वतंत्रता की गारंटी देता है। फिर भी सवाल बना हुआ है कि क्या हर महिला अपने जीवन के फैसले लेने के लिए उतनी ही आजाद है?

कई महिलाओं के लिए आजादी आज भी परिवार, समाज, जाति, परंपरा और ‘इज्जत’ की दीवारों से टकराती है। और इतिहास में ऐसी कई महिलाएं हुई हैं जिन्होंने इन दीवारों को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन इसकी कीमत उन्हें अपनी जिंदगी से चुकानी पड़ी।

मथुरा... जिसकी लड़ाई ने कानून बदल दिया

1972 में महाराष्ट्र की एक आदिवासी किशोरी, जिसे मथुरा के नाम से जाना गया, पुलिस हिरासत में यौन हिंसा का शिकार हुई। मामला अदालत तक पहुंचा, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट से आरोपियों के बरी होने के बाद देशभर में महिला संगठनों ने विरोध किया। सवाल उठाया गया कि किसी महिला के शरीर पर चोट के निशान न होने का मतलब उसकी सहमति कैसे माना जा सकता है।

मथुरा खुद शायद देश की सबसे बड़ी कानूनी बहस का चेहरा बनना नहीं चाहती थी, लेकिन उसकी कहानी ने पूरे देश की महिलाओं को यह सवाल पूछने का साहस दिया कि आखिर महिला की ‘ना’ को साबित करने की जिम्मेदारी उसी पर क्यों हो?

इस मामले के बाद हुए आंदोलन ने 1983 के आपराधिक कानून संशोधन में महत्वपूर्ण बदलावों की राह बनाई। हिरासत में होने वाले बलात्कार के लिए अलग प्रावधान और सहमति को लेकर कानूनी सुरक्षा मजबूत हुई।

लेकिन विडंबना यह है कि जिस महिला के मामले ने कानून बदलने की लड़ाई को जन्म दिया, उसकी अपनी जिंदगी में न्याय और सम्मान की कहानी उतनी आसान नहीं रही।

भंवरी देवी... बाल विवाह रोकने निकलीं तो खुद निशाना बनीं

राजस्थान की भंवरी देवी ने 1990 के दशक में महिला विकास कार्यक्रम के तहत ‘साथिन’ के रूप में काम किया। उन्होंने बाल विवाह रोकने की कोशिश की। इसी प्रयास के बाद 1992 में उनके साथ सामूहिक यौन हिंसा की घटना हुई। मामले में पुलिस और न्याय व्यवस्था के शुरुआती रवैये पर गंभीर सवाल उठे और बाद में निचली अदालत से आरोपियों को बलात्कार के आरोप में बरी किया गया।

भंवरी देवी ने हार नहीं मानी। उनका मामला महिलाओं के संगठित आंदोलन का हिस्सा बना और लास्ट  1997 में सुप्रीम कोर्ट की विशाखा गाइडलाइंस तक पहुंचा, जिसने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए।

लेकिन यहां भी सबसे बड़ा सवाल यही रहा-जिस महिला की लड़ाई से देश की लाखों कामकाजी महिलाओं के अधिकार मजबूत हुए, क्या उसे खुद वह न्याय मिला जिसके लिए उसने वर्षों संघर्ष किया?

शाह बानो... अपने अधिकार के लिए अदालत पहुंचीं

शाह बानो का मामला भी आजादी के बाद महिलाओं के अधिकार की लड़ाई का महत्वपूर्ण अध्याय है। तलाक के बाद उन्होंने अपने भरण-पोषण के अधिकार के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया और उन्हें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने का अधिकार माना।

इस फैसले के बाद देश में तीखी राजनीतिक और सामाजिक बहस छिड़ गई। विरोध के बीच तत्कालीन सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित किया, जिसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रभाव को सीमित किया। इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया-महिला के व्यक्तिगत अधिकार और धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था के बीच टकराव में उसकी अपनी आवाज कितनी सुनी जाती है?

आजादी मिली, लेकिन लड़ाई खत्म नहीं हुई

मथुरा, भंवरी देवी और शाह बानो की कहानियां अलग-अलग हैं, लेकिन इनके बीच एक समान धागा दिखाई देता है। तीनों मामलों में महिलाओं को सिर्फ किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस सोच से संघर्ष करना पड़ा जिसमें महिला की इच्छा, आवाज और अधिकार को अक्सर परिवार, समाज या व्यवस्था के बाद रखा जाता है।

आज स्थिति पहले से बदली है। महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, राजनीति और कानून में भागीदारी बढ़ी है। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए कानून है, घरेलू हिंसा के खिलाफ कानूनी प्रावधान हैं और महिलाओं को संपत्ति सहित कई अधिकार मिले हैं।

फिर भी कानून और सामाजिक व्यवहार के बीच की दूरी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

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असली आजादी का सवाल

आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे तो शायद हमें एक सवाल खुद से भी पूछना चाहिए-क्या आजादी सिर्फ देश की सीमाओं से विदेशी शासन हट जाने का नाम है?

अगर किसी बेटी को अपने कपड़े चुनने, पढ़ाई करने, नौकरी करने, अपनी पसंद से शादी करने या अकेले अपने जीवन का फैसला लेने के लिए हर बार समाज की मंजूरी चाहिए, तो उसकी आजादी कितनी पूरी है?

तिरंगा पूरे देश में शान से लहराएगा। लेकिन असली आजादी उस दिन पूरी होगी, जब किसी महिला को अपने अधिकार के लिए अपने ही घर, समाज या व्यवस्था से लड़ना न पड़े।

क्योंकि देश की आजादी सिर्फ यह नहीं कि हम पर कोई विदेशी शासन न करे। आजादी यह भी है कि हर महिला अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सके-बिना डर, बिना दबाव और बिना इस सवाल के कि “लोग क्या कहेंगे?”

Location :  New Delhi

Published :  14 August 2026, 3:15 PM IST