युवाओं में एंजायटी और अकेलेपन का संकट गहराया, आत्मिक शांति के लिए अध्यात्म जरूरी: डॉ चिन्मय पांड्या

अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ चिन्मय पांड्या ने युवाओं में बढ़ते तनाव, डिप्रेशन और अकेलेपन के लिए टेक्नोलॉजी को बड़ी वजह बताया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने जीवन को आभासी बना दिया है। समाधान के रूप में अध्यात्म, संस्कार और सही शिक्षा को अपनाना बेहद जरूरी है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 26 April 2026, 8:17 AM IST

New Delhi: डाइनामाइट न्यूज़ के चर्चित पॉडकास्ट The Candid Talk में इस बार विशेष अतिथि रहे डॉ चिन्मय पांड्या, जिन्होंने आधुनिक जीवन की चुनौतियों, युवाओं में बढ़ते तनाव और अध्यात्म की भूमिका पर विस्तार से अपने विचार साझा किए। अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख और देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति के रूप में कार्यरत डॉ पांड्या ने जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर बेबाक राय रखी।

अध्यात्म की ओर झुकाव: कोई अचानक फैसला नहीं

डॉ पांड्या ने बताया कि उनका अध्यात्म की ओर रुझान अचानक नहीं था, बल्कि बचपन से ही आश्रम के वातावरण में पले-बढ़े होने का परिणाम है। उन्होंने अपने दादा पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके व्यक्तित्व और तपस्या ने उन्हें हमेशा भारतीय संस्कृति के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी।

युवाओं में तनाव और एंजायटी: टेक्नोलॉजी बड़ी वजह

आज के युवाओं में बढ़ते तनाव और डिप्रेशन पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी इसका एक बड़ा कारण है। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने लोगों को आभासी दुनिया में धकेल दिया है, जहां वे लाइक्स और कमेंट्स के आधार पर अपनी पहचान तय करने लगे हैं। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2012 से 2026 के बीच डिप्रेशन में 161% और सेल्फ-हार्म में 187% की वृद्धि हुई है।

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मोबाइल ने छीना बचपन

डॉ पांड्या ने छोटे बच्चों के मोबाइल उपयोग को "सबसे बड़ी दुर्घटना" बताया। उन्होंने कहा कि बच्चों का बचपन धीरे-धीरे खत्म हो रहा है और उसकी जगह चिंता और मानसिक दबाव ले रहे हैं। उन्होंने अभिभावकों को सचेत करते हुए कहा कि इंटरनेट पर बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।

अकेलापन और दिखावटी संबंध बढ़े

उन्होंने कहा कि आज व्यक्ति भीड़ में भी अकेला है। दिखावटी संबंधों और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में लोग अपने मूल्यों और संबंधों को खोते जा रहे हैं। यही स्थिति लंबे समय में मानसिक समस्याओं को जन्म देती है।

युवा अध्यात्म से जुड़ना चाहते हैं

इस सवाल पर कि क्या युवा भगवान से जुड़ना चाहते हैं, उन्होंने कहा कि आज का युवा जुड़ना चाहता है, लेकिन पहले उसकी मूलभूत जरूरतें पूरी होनी चाहिए। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि भौतिक संतुष्टि के बाद ही व्यक्ति आध्यात्मिक शांति की तलाश करता है।

अध्यात्म की शुरुआत: अनुभव जरूरी

उन्होंने युवाओं को हरिद्वार स्थित शांतिकुंज आने का निमंत्रण देते हुए कहा कि अध्यात्म को केवल पढ़कर नहीं, बल्कि अनुभव करके समझा जा सकता है।

अध्यात्म का कड़वा सच

डॉ पांड्या ने साफ कहा कि अध्यात्म आसान नहीं है। यह आत्म-परिष्कार की कठिन प्रक्रिया है, जिसमें चमत्कार की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

शिक्षा प्रणाली पर सवाल

उन्होंने वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि शिक्षा केवल सिलेबस तक सीमित हो गई है, जबकि वास्तविक शिक्षा आचरण और संस्कार से मिलती है। शिक्षा के व्यावसायीकरण को उन्होंने चरित्र निर्माण में बाधा बताया।

विज्ञान और अध्यात्म: विरोध नहीं, पूरक

उन्होंने विज्ञान और अध्यात्म को एक-दूसरे का पूरक बताया। उनके अनुसार, दोनों मिलकर ही जीवन को संतुलित और सार्थक बना सकते हैं।

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राजनीति से दूरी, समाज सेवा पर जोर

राजनीति में आने के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका मार्ग अलग है। उन्होंने अपने पिता डॉ प्रणव पांड्या द्वारा राज्यसभा सदस्यता ठुकराने के फैसले को त्याग और मूल्यों का उदाहरण बताया।

युवाओं के लिए संदेश

अंत में डॉ पांड्या ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि देश और भविष्य दोनों उनके हैं, इसलिए बदलाव की जिम्मेदारी भी उन्हीं को उठानी होगी। उन्होंने सकारात्मक सोच और अच्छे कर्मों को जीवन में अपनाने पर जोर दिया। इस  बातचीत से यह स्पष्ट हुआ कि जीवन केवल बाहरी उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। वास्तविक सफलता भीतर की स्थिरता, संतुलन और आत्मिक शांति में ही है।

Location :  New Delhi

Published :  26 April 2026, 8:17 AM IST