‘कानूनी दायरे में हो प्रोटेस्ट’: व्यापक पाबंदियों और सामूहिक हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन और दिल्ली में भारी पाबंदियों पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि प्रदर्शन का अधिकार पुलिस एक्ट और कानून के दायरे से बाहर नहीं हो सकता। कोर्ट ने केंद्रीय गृह सचिव, दिल्ली पुलिस कमिश्नर और DMRC को नोटिस जारी कर 13 अक्टूबर 2026 तक जवाब मांगा है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 12 October 2026, 8:29 AM IST

New Delhi: देश की राजधानी दिल्ली में हो रहे प्रदर्शन और इसके चलते उपजे हालात पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और स्पष्ट टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि नागरिकों को अपनी बात रखने और विरोध प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है, लेकिन यह अधिकार किसी भी सूरत में पुलिस अधिनियम और कानून के दायरे से बाहर नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उपयोग स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए।

अवमानना नोटिस और विशेष सुनवाई

यह पूरा मामला कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में लगाए गए व्यापक प्रतिबंधों और कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों के उल्लंघन से जुड़ा है। अदालत के पूर्व निर्देशों की अवहेलना का आरोप लगाते हुए एक अवमानना याचिका दायर की गई थी, जिस पर जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने विशेष अवकाशकालीन सुनवाई की।

अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे प्रथम दृष्टया अवमानना का मामला माना है। पीठ ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) के चेयरपर्सन को औपचारिक नोटिस जारी कर दिए हैं। इन सभी अधिकारियों को 13 अक्टूबर, 2026 तक अपने जवाब के साथ पूर्व आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है, हालांकि फिलहाल उन्हें व्यक्तिगत पेशी से राहत दी गई है।

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वकीलों और मीडिया की सुगमता पर जोर

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य कामकाजी नागरिकों को अपने पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन में किसी प्रकार की बाधा का सामना न करना पड़े। इंटरनेट सेवाओं को लेकर अदालत ने स्पष्ट किया कि जब सेवाओं को निर्बाध रखने की बात कही जाती है, तो इसका मतलब सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत प्रशासनिक शक्तियों को पूरी तरह समाप्त करना नहीं है।

साथ ही, पीठ ने यह भी ताकीद की कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा-163 के तहत तय क्षेत्र से बाहर के लोगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि स्थानीय प्रतिबंधों के दायरे को खींचकर गुरुग्राम जैसे सुदूर इलाकों तक या निर्धारित जोन से बाहर लोगों को पकड़ना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

वकीलों के गंभीर आरोप और कोर्ट के निर्देश

अदालत में वरिष्ठ वकीलों ने प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। राजद सांसद मनोज झा की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि पुलिस ट्रेन से सफर कर रहे लोगों को भी हिरासत में ले रही है और जंतर-मंतर के चार किलोमीटर के दायरे से बाहर मौजूद शांतिपूर्ण नागरिकों को भी उठाया जा रहा है।

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वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दावा किया कि शहर भर में करीब 45 हिरासत केंद्र बनाए गए हैं, जहां विपक्षी नेताओं समेत लगभग 7,000 लोगों को बंद किया गया है। इसके अलावा, वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने आम नागरिकों की आवाजाही को सामान्य करने, सभी अनावश्यक बैरिकेड हटाने और बंद पड़े मेट्रो स्टेशनों को तुरंत चालू करने की मांग की।

इन तमाम दलीलों और स्थितियों पर गौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के आसपास बीएनएसएस की धारा-163 लागू होने से संबंधित कोई बोर्ड अभी भी लगा हुआ है, तो उसे तुरंत हटाया जाए, ताकि नागरिकों और वकीलों को अदालत तक पहुंचने में कोई असुविधा न हो।

Location :  New Delhi

Published :  12 October 2026, 8:25 AM IST