‘करो या मरो’… 83 साल पहले आज ही के दिन गूंजा था वो नारा, जिसने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर कर दिया मजबूर

8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के 'करो या मरो' के आह्वान के साथ शुरू हुआ भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक अध्याय बना। जानें आंदोलन की वजह, प्रमुख घटनाएं, गुमनाम नायकों का योगदान और कैसे इस जनआंदोलन ने आजादी की राह को मजबूत किया।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 8 August 2026, 6:09 PM IST

New Delhi: 8 अगस्त 1942 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह ऐतिहासिक दिन है, जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) ने आजादी की लड़ाई को निर्णायक मोड़ पर पहुंचा दिया। बंबई (अब मुंबई) के ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) की बैठक में पारित इस प्रस्ताव ने पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनक्रांति का स्वरूप ले लिया। गांधी जी के "करो या मरो" के आह्वान ने करोड़ों भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए एकजुट कर दिया।

क्रिप्स मिशन की विफलता बनी आंदोलन की बड़ी वजह

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं से बिना सलाह किए भारत को युद्ध में झोंक दिया। वहीं 1942 में क्रिप्स मिशन तत्काल स्वतंत्रता का स्पष्ट आश्वासन देने में विफल रहा। इससे देशभर में असंतोष बढ़ा और महात्मा गांधी ने स्पष्ट कहा कि अब अंग्रेजों को भारत छोड़ देना चाहिए।

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'करो या मरो' बना आजादी का सबसे बड़ा नारा

8 अगस्त 1942 को गांधी जी ने ऐतिहासिक भाषण देते हुए भारतीयों से कहा- "करो या मरो"। इस आह्वान के बाद "भारत छोड़ो" का नारा पूरे देश में फैल गया और आंदोलन ने राष्ट्रीय जनक्रांति का रूप ले लिया।

'करो या मरो' बना आजादी का सबसे बड़ा नारा (Img: PIB)

नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी नहीं रुका आंदोलन

9 अगस्त 1942 की सुबह महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल सहित कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्व को जेल भेजने से आंदोलन समाप्त हो जाएगा, लेकिन इसके विपरीत आम जनता ने आंदोलन की कमान संभाल ली और पूरे देश में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए।

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जन-जन बना स्वतंत्रता सेनानी

भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत आम भारतीय थे। विद्यार्थियों ने पढ़ाई छोड़ आंदोलन में भाग लिया, किसानों और मजदूरों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाई, जबकि महिलाओं ने भूमिगत गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हजारों लोगों ने जेल, लाठीचार्ज और यातनाएं झेलीं, लेकिन स्वतंत्रता का संकल्प नहीं छोड़ा।

जन-जन बना स्वतंत्रता सेनानी (Img: PIB)

गुमनाम नायकों का भी रहा अमूल्य योगदान

इस आंदोलन में केवल बड़े नेताओं का ही नहीं, बल्कि हजारों गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। ग्रामीणों, युवाओं और सामान्य नागरिकों ने अपने साहस और बलिदान से अंग्रेजी शासन को चुनौती दी। उनके योगदान ने आजादी की लड़ाई को नई ऊर्जा दी।

आजादी की राह का निर्णायक मोड़ बना आंदोलन

हालांकि ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कठोर दमन के जरिए दबा दिया, लेकिन यह स्पष्ट हो गया कि भारत पर शासन लंबे समय तक संभव नहीं है। भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता की मांग को और मजबूत किया और अंततः 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ।

आज भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ पर देश उन सभी ज्ञात और अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देता है, जिन्होंने अपने साहस, त्याग और बलिदान से स्वतंत्र भारत का सपना साकार किया।

Location :  New Delhi

Published :  8 August 2026, 6:09 PM IST