वाल्मीकि जयंती पर जानें उनकी अनसुनी कहानी, दिल्ली में है वाल्मीकि मंदिर, जहां 214 दिन रुके थे महात्मा गांधी

महर्षि वाल्मीकि जयंती पर जानिए दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित राष्ट्रीय वाल्मीकि मंदिर का इतिहास। धार्मिक मान्यताओं, वाल्मीकि अखाड़े की मान्यता, रामायण के सामाजिक समरसता संदेश और महात्मा गांधी के 214 दिन के प्रवास से जुड़ी खास बातें इस मंदिर को विशिष्ट बनाती हैं।

Post Published By: Mayank Tawer
Updated : 26 October 2026, 5:58 PM IST
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New Delhi: महर्षि वाल्मीकि प्रकटोत्सव के अवसर पर दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित राष्ट्रीय महर्षि वाल्मीकि मंदिर एक बार फिर चर्चा में है। यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक समरसता, स्वतंत्रता आंदोलन और ऐतिहासिक स्मृतियों से भी जुड़ा हुआ है। वाल्मीकि पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु कृष्ण साह विद्यार्थी नंदगिरी महाराज के अनुसार, इस मंदिर से जुड़ी परंपराएं त्रेतायुग से लेकर आधुनिक भारत तक की कई महत्वपूर्ण कथाओं को समेटे हुए हैं।

वाल्मीकि अखाड़े को मिली मान्यता, जूना अखाड़े से जुड़ाव

जगद्गुरु कृष्ण साह विद्यार्थी नंदगिरी महाराज ने बताया कि महर्षि वाल्मीकि को रामायण के रचयिता और आदि कवि के रूप में जाना जाता है। उनके मुताबिक, उनके पूर्ववर्ती संत संतोष राम शास्त्री ने वाल्मीकि अखाड़े की स्थापना की दिशा में प्रयास किए थे। वे कुंभ मेलों में साधु-संतों और समाज के लोगों को लेकर जाते थे। लंबे प्रयासों और संतों के साथ संवाद के बाद 23 जुलाई 2026 को अखाड़ा परिषद ने वाल्मीकि अखाड़े को मान्यता दी और उसे जूना अखाड़े से संबद्ध किया। उन्होंने इसे सामाजिक समरसता और धार्मिक एकता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। इस संबंध में किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

रामायण में सामाजिक समरसता का संदेश

जगद्गुरु ने कहा कि रामायण में निषादराज, केवट, वानर और भालू जैसे पात्रों के साथ भगवान राम के संबंध सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं। उनके अनुसार, महर्षि वाल्मीकि की रचना समाज को जाति और उपजाति के भेदभाव से ऊपर उठकर एकता के साथ रहने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि को किसी एक समुदाय तक सीमित रखने के बजाय उनके विचारों और योगदान को व्यापक समाज तक पहुंचाना चाहिए। उनके मुताबिक, समरसता का वास्तविक अर्थ केवल विचारों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।

मंदिर से जुड़ी हैं प्राचीन धार्मिक मान्यताएं

महाराज ने मंदिर की प्राचीनता से जुड़ी मान्यताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि परंपरा के अनुसार, त्रेतायुग में महर्षि वाल्मीकि इस स्थान पर आए थे। उन्होंने अमृतसर और लव-कुश से जुड़ी धार्मिक कथा का भी जिक्र किया। हालांकि, इन प्रसंगों को धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए। उन्होंने दिल्ली के प्राचीन क्षेत्र इंद्रप्रस्थ और खांडवप्रस्थ से जुड़ी कथाओं का उल्लेख करते हुए धौलाकुआं और पंचकुइयां जैसे स्थानों के नामों के पीछे प्रचलित मान्यताओं की जानकारी भी दी।

गांधी जी के प्रवास से जुड़ा है मंदिर का आधुनिक इतिहास

मंदिर से जुड़ा आधुनिक इतिहास महात्मा गांधी के प्रवास के कारण भी महत्वपूर्ण माना जाता है। जगद्गुरु कृष्ण साह विद्यार्थी नंदगिरी महाराज के अनुसार, गांधी जी वर्ष 1946 में इस परिसर में आए थे और यहां कुल 214 दिन तक रुके। उन्होंने बताया कि जिस स्थान पर गांधी जी ठहरे थे, वहां पहले बच्चों के लिए स्कूल संचालित होता था। महाराज के मुताबिक, गांधी जी चाहते थे कि बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो। उन्होंने परिसर में स्वच्छता पर भी विशेष जोर दिया और नियमित साफ-सफाई की। उनके अनुसार, गांधी जी 1 जून 1947 को यहां से रवाना हुए थे। इस तरह मंदिर की पहचान धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी स्मृतियों के कारण भी बनी हुई है। महर्षि वाल्मीकि की शिक्षाओं और गांधी जी के जीवन से जुड़े इन प्रसंगों को आज भी सामाजिक एकता, शिक्षा और स्वच्छता के संदेश के रूप में याद किया जाता है।

Location :  New Delhi

Published :  26 October 2026, 5:58 PM IST

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