बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर बैन नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने बताया क्यों जरूरी है ‘चाइल्ड मोड’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट इस्तेमाल करने का अधिकार बच्चों को भी है। उम्र के आधार पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय कोर्ट ने पैरेंटल कंट्रोल, ‘चाइल्ड मोड’ और ऑनलाइन शोषणकारी कंटेंट पर सख्त कार्रवाई जैसे उपायों पर जोर दिया।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 17 October 2026, 2:14 PM IST
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New Delhi: बच्चे इंटरनेट चलाएं या नहीं, सोशल मीडिया पर उनकी उम्र के हिसाब से पाबंदी लगनी चाहिए या नहीं और ऑनलाइन खतरों से उन्हें कैसे बचाया जाए- इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि इंटरनेट का इस्तेमाल करने का अधिकार हर व्यक्ति को है, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं। केवल उम्र के आधार पर बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना उचित तरीका नहीं है। इसके बजाय उनकी ऑनलाइन सुरक्षा के लिए मजबूत पैरेंटल कंट्रोल, हानिकारक कंटेंट की रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया अकाउंट में विशेष ‘चाइल्ड मोड’ जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं।

15 अक्टूबर 2026 के आदेश में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी चंद्रन की पीठ ने इंटरनेट इस्तेमाल के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) से जोड़ा। अदालत के मुताबिक, बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा नहीं किया जाना चाहिए। बच्चों को सुरक्षित डिजिटल माहौल भी मिलना चाहिए और शिक्षा, जानकारी तथा अभिव्यक्ति के लिए इंटरनेट तक पहुंच भी।

बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना समाधान नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने इस विचार पर सवाल उठाया कि एक निश्चित उम्र से कम बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने से पूरी तरह रोक दिया जाए। अदालत का तर्क था कि केवल प्रतिबंध लगा देने से बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल बंद नहीं कर देते। वे माता-पिता और अधिकारियों की जानकारी के बिना दूसरे प्लेटफॉर्म या वेबसाइटों पर जा सकते हैं, जहां उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं होते। ऐसी स्थिति में बच्चों के सामने ऑनलाइन धोखाधड़ी, साइबर बुलिंग, अनजान लोगों के बहकावे और यौन शोषण जैसे खतरे बढ़ सकते हैं।

‘चाइल्ड मोड’ से बच्चों को मिल सकती है सुरक्षा?

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए सोशल मीडिया अकाउंट में विशेष ‘चाइल्ड मोड’ जैसे उपायों पर जोर दिया। इसका उद्देश्य बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना नहीं, बल्कि उनके अकाउंट और ऑनलाइन गतिविधियों को उम्र के लिहाज से अधिक सुरक्षित बनाना है। ऐसे मोड में बच्चों के अकाउंट डिफॉल्ट रूप से प्राइवेट रखे जा सकते हैं। अनजान वयस्कों के संदेशों और संपर्कों पर रोक या सख्त नियंत्रण लगाया जा सकता है। बच्चों को दिखाई जाने वाली सामग्री और विज्ञापनों को भी उनकी उम्र के अनुरूप नियंत्रित करने के उपाय किए जा सकते हैं।

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पैरेंटल कंट्रोल से कैसे सुरक्षित रह सकते हैं बच्चे?

बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने में माता-पिता और अभिभावकों की भूमिका भी अहम है। केवल मोबाइल छीन लेना या इंटरनेट बंद कर देना हमेशा कारगर नहीं होता। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि ऑनलाइन किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और निजी जानकारी साझा करने से क्या खतरे हो सकते हैं।

बाल यौन शोषण से जुड़े कंटेंट पर सख्ती जरूरी

अदालत ने ऑनलाइन बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़े कंटेंट के बार-बार सामने आने पर चिंता जताई। ऐसे कंटेंट की पहचान, रिपोर्टिंग और उसे हटाने के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म को ऐसी सामग्री के प्रसार पर रोक लगाने और शिकायत मिलने पर कार्रवाई करने के लिए जवाबदेह व्यवस्था अपनानी होगी।

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सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कोई पाबंदी नहीं लगेगी?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि बच्चों के लिए सभी ऑनलाइन सेवाएं और कंटेंट बिना किसी सीमा के उपलब्ध रहेंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों को इंटरनेट का अधिकार देने का मतलब यह नहीं है कि उनकी उम्र के लिहाज से सुरक्षा उपायों की जरूरत खत्म हो जाती है। वयस्कों के लिए बनी सामग्री या बच्चों के लिए स्वभाव से हानिकारक सेवाओं पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल आजादी जरूरी

आज इंटरनेट बच्चों की पढ़ाई, जानकारी हासिल करने और दुनिया से जुड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। इसके साथ ही ऑनलाइन शोषण, साइबर बुलिंग और अनुचित कंटेंट के खतरे भी मौजूद हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी चुनौती के बीच संतुलन बनाने की जरूरत को रेखांकित करती है।

Location :  New Delhi

Published :  17 October 2026, 2:13 PM IST

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