पहले शरीर थकता था, अब दिमाग क्यों हो रहा परेशान? कामकाज में आए बड़े बदलाव की कहानी

आज का युवा बेरोजगारी से भी परेशान है और नौकरी मिलने के बाद भी सुकून में नहीं है। आखिर 1980 और 1990 के दशक से आज के कामकाज में ऐसा क्या बदल गया कि मानसिक तनाव, भविष्य की चिंता और काम का दबाव जिंदगी का हिस्सा बनते जा रहे हैं?

Updated : 23 October 2026, 1:59 PM IST
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नई दिल्ली: सुबह आंख खुलते ही मोबाइल पर नोटिफिकेशन, दिन की शुरुआत से पहले काम की सूची, ऑफिस पहुंचते ही मीटिंग और टारगेट, लगातार बदलती प्राथमिकताएं और घर लौटने के बाद भी फोन पर आते मैसेज। आज के एक बड़े वर्ग के कामकाजी लोगों की दिनचर्या कुछ ऐसी बन गई है। वहीं, नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं के सामने प्रतियोगिता, आर्थिक आत्मनिर्भरता और भविष्य सुरक्षित करने की चुनौती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आज के दौर में काम करना पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल हो गया है? क्या पहले लोग शारीरिक मेहनत करते थे और अब मानसिक मेहनत का बोझ बढ़ गया है?

इस सवाल का जवाब सिर्फ इतना नहीं है कि पहले का जमाना अच्छा था और आज का खराब। असल बदलाव काम के तरीके, तकनीक, आर्थिक जरूरतों, नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक अपेक्षाओं और काम के बाद मिलने वाले आराम में आया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी मानता है कि जरूरत से ज्यादा काम, लंबे कार्य घंटे, नौकरी की असुरक्षा, कम वेतन, सहयोग की कमी और काम-परिवार के बीच टकराव मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।

पहले और आज के काम में क्या बदला?

1980 के दशक और उससे पहले भारत में बड़ी आबादी खेती, निर्माण, छोटे कारोबार, हस्तशिल्प, कारखानों और दूसरे श्रम-आधारित व्यवसायों से जुड़ी थी। इन कामों में शारीरिक मेहनत, लंबा कार्यदिवस, मौसम की मार, दुर्घटनाओं का खतरा और आमदनी की अनिश्चितता जैसी चुनौतियां थीं। किसानों को फसल खराब होने की चिंता रहती थी, मजदूरों को काम और मजदूरी की, जबकि नौकरीपेशा लोगों को सीमित अवसरों और परिवार की जिम्मेदारियों का सामना करना पड़ता था।

इसलिए यह कहना गलत होगा कि पहले के लोग कम तनाव में रहते थे। उस दौर में भी मानसिक परेशानी थी, लेकिन उसके कारण और उसे व्यक्त करने के तरीके आज से अलग हो सकते थे। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता और पेशेवर सहायता तक पहुंच भी सीमित थी।

आज तस्वीर अधिक विविध है। खेती और निर्माण जैसे क्षेत्रों में शारीरिक श्रम अब भी जारी है, लेकिन शहरों में सेवाओं, आईटी, बैंकिंग, मीडिया, शिक्षा, ग्राहक सेवा और डिजिटल कारोबार से जुड़े अनेक कामों में जानकारी को तेजी से समझने, लगातार संवाद करने, समय पर निर्णय लेने और तय समयसीमा में नतीजे देने की अपेक्षा बढ़ी है।

पहले भी मानसिक मेहनत वाले काम होते थे-शिक्षक, डॉक्टर, अधिकारी, व्यापारी और लेखाकार भी निर्णय लेते थे और जिम्मेदारियां संभालते थे। फर्क यह है कि डिजिटल तकनीक ने कई क्षेत्रों में काम की गति, निगरानी और उपलब्धता के तरीके बदल दिए हैं।

शरीर से ज्यादा दिमाग क्यों थक रहा है?

आज कई नौकरियों में कर्मचारी को सिर्फ अपना काम पूरा नहीं करना होता। उसे ईमेल का जवाब देना, मीटिंग में शामिल होना, रिपोर्ट तैयार करना, नए टूल सीखना, प्रदर्शन के आंकड़े देखना और अचानक मिलने वाले काम भी संभालने पड़ते हैं। एक काम पर ध्यान केंद्रित करने के बीच बार-बार दूसरे काम पर जाना मानसिक थकान बढ़ा सकता है।

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मोबाइल और इंटरनेट ने काम आसान बनाया है, लेकिन कई जगह काम और निजी जीवन की सीमा भी धुंधली कर दी है। ऑफिस का समय खत्म होने के बाद भी मैसेज, ईमेल और ऑनलाइन मीटिंग का दबाव बना रह सकता है। घर से काम करने वाले कर्मचारियों के लिए तो कई बार कार्यस्थल और निजी जीवन के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना और कठिन हो जाता है।

नौकरी नहीं तो चिंता, नौकरी मिली तो दबाव क्यों?

आज के युवाओं के सामने एक दोहरी चुनौती है। नौकरी नहीं मिलने पर आर्थिक आत्मनिर्भरता, परिवार की अपेक्षाओं और भविष्य की चिंता सताती है। नौकरी मिलने पर वेतन, प्रदर्शन, प्रमोशन, नौकरी बचाए रखने और बेहतर अवसर हासिल करने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।

Location :  New Delhi

Published :  23 October 2026, 1:59 PM IST

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