लोकपाल ने सात BMW लग्जरी कारों की खरीद का विवादित टेंडर रद्द कर दिया। विपक्ष और सिविल सोसाइटी की तीखी आलोचना, नैतिक सवाल और सार्वजनिक धन की चिंता ने इसे मजबूर किया। क्या यह केवल विवाद टालने का कदम था या साख बचाने की रणनीति?

लोकपाल ने BMW कार टेंडर वापस लिया (Img- Internet)
New Delhi: लोकपाल ने सात BMW 3 Series 330Li कारों की खरीद का टेंडर रद्द कर दिया है। यह फैसला 16 दिसंबर 2025 को आधिकारिक संशोधन (कॉरिजेंडम) के माध्यम से औपचारिक रूप दिया गया। अधिकारियों के अनुसार, यह निर्णय लोकपाल की पूर्ण पीठ ने लिया।
16 अक्टूबर 2025 को लोकपाल ने एक रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी करते हुए सात BMW 3 Series 330Li कारों की आपूर्ति के लिए बोली मांगी थी। इन कारों को अध्यक्ष और छह सदस्यों के व्यक्तिगत उपयोग के लिए आवंटित किया जाना था।
टेंडर सामने आते ही विपक्ष और सिविल सोसाइटी में असंतोष फैल गया। आलोचकों ने इसे लोकपाल की मूल भूमिका के विपरीत बताया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर लोकपाल को “शौकपाल” तक कह दिया। वहीं, अमिताभ कांत ने सार्वजनिक रूप से आग्रह किया कि भारत में बनी इलेक्ट्रिक कारों पर विचार किया जाए।
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विशेषज्ञों का कहना था कि भ्रष्टाचार विरोधी संस्था द्वारा लग्जरी कारें खरीदना उसकी नैतिक साख को कमजोर करता। जनता और आलोचकों ने सवाल उठाए कि क्या सार्वजनिक धन का यह उपयोग वाजिब था।
लोकपाल का अहम फैसला (Img- Internet)
डॉक्युमेंट्स के अनुसार, BMW 330Li M Sport मॉडल की अनुमानित ऑन-रोड कीमत सात कारों के लिए करीब 5 करोड़ रुपये थी। ये वाहन लोकपाल के अध्यक्ष, सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस ए एम खानविलकर और छह अन्य सदस्यों के लिए थे।
टेंडर में कारों की आपूर्ति के अलावा ड्राइवरों और कर्मचारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण की शर्तें भी थीं। प्रशिक्षण में कार के कंट्रोल, सुरक्षा फीचर्स, इमरजेंसी हैंडलिंग, पार्किंग तकनीक और फ्यूल एफिशिएंसी मोड शामिल थे।
लोकपाल ने आधिकारिक तौर पर टेंडर रद्द करने का विस्तृत कारण नहीं बताया। अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, यह निर्णय संस्था के शीर्ष स्तर की चर्चाओं के बाद लिया गया। यह कदम विवाद को शांत करने और जनता के बीच लोकपाल की विश्वसनीयता बनाए रखने के रूप में देखा जा रहा है।
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विशेषज्ञों और आलोचकों का सुझाव है कि लोकपाल अब भारत में बनी इलेक्ट्रिक या कम लागत वाली सरकारी वाहन विकल्पों पर ध्यान दे। इससे न केवल खर्च में कटौती होगी, बल्कि संस्था की नैतिक साख भी मजबूत रहेगी।