कांपते हाथ, झुका शरीर और चेहरे पर 84 की बेबसी, बुजुर्ग जोड़ता रहा हाथ और कानून चलाता रहा चाबूक

जिस उम्र में लोग अपने परिवार के बीच शांत जीवन बिताते हैं, भगवान की भक्ति में समय लगाते हैं और बुढ़ापे का सहारा खोजते हैं, उस उम्र में एक 84 वर्षीय बुजुर्ग को जेल की सलाखों के पीछे जाने की तैयारी करनी पड़ रही है। पढ़ें पूरी खबर

Post Published By: Subhash Raturi
Updated : 3 June 2026, 7:49 PM IST

New Delhi:  कहते हैं कानून के हाथ लंबे होते हैं और इंसाफ मिलने में चाहे कितनी भी देर क्यों न हो, कानून अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है।" बिहार के वैशाली जिले से सामने आया यह मामला इसी कहावत को सच साबित करता है।

जिस उम्र में लोग अपने परिवार के बीच शांत जीवन बिताते हैं, भगवान की भक्ति में समय लगाते हैं और बुढ़ापे का सहारा खोजते हैं, उस उम्र में एक 84 वर्षीय बुजुर्ग को जेल की सलाखों के पीछे जाने की तैयारी करनी पड़ रही है। वजह है 34 साल पुराना एक खूनी संघर्ष, जिसका फैसला अब जाकर अदालत ने सुनाया है।

1992 में शुरू हुई थी खूनी रंजिश

मामला वैशाली जिले के राघोपुर प्रखंड के जुड़ावनपुर इलाके का है। वर्ष 1992 में अदालत राय अपनी पत्नी रामशकी देवी के साथ घर के बाहर बैठे हुए थे। आरोप है कि इसी दौरान गांव के ही दीप राय अपने परिवार के साथ वहां पहुंचे और रास्ते पर कांच के टुकड़े बिछाने लगे।

जब अदालत राय और उनकी पत्नी ने इसका विरोध किया, तो विवाद हिंसक झड़प में बदल गया। आरोप है कि दीप राय और उनके परिजनों ने लाठी-डंडों और हथियारों से हमला कर दिया। घटना के बाद पुलिस ने एक ही परिवार के पांच लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था।

34 साल तक चलता रहा मुकदमा, 4 आरोपी दुनिया छोड़ गए

इस केस की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि फैसले तक पहुंचने में 34 साल लग गए। इस दौरान नामजद पांच आरोपियों में से चार की मौत हो गई। समय की मार और उम्र की रफ्तार के बीच केवल एक आरोपी दीप राय जीवित बचा।

लंबी सुनवाई और गवाहों के बयानों के आधार पर अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत ने दीप राय को आईपीसी की धारा 147, 148, 307 (हत्या का प्रयास) और आर्म्स एक्ट की धारा 134 के तहत दोषी करार दिया है।

वायरल तस्वीर ने सबको चौंकाया

फैसले के बाद कोर्ट परिसर से बाहर निकलते दीप राय की तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। तस्वीर में 84 वर्षीय बुजुर्ग इतनी कमजोर स्थिति में दिखाई दे रहे हैं कि उन्हें चलने-फिरने के लिए दो लोगों का सहारा लेना पड़ रहा है।

कांपते हाथ, झुका हुआ शरीर और उम्र की बेबसी साफ दिखाई दे रही है। लेकिन इन सबके बावजूद कानून ने उन्हें राहत नहीं दी। अदालत ने साफ संदेश दिया कि अपराध कितना भी पुराना क्यों न हो, न्याय की प्रक्रिया रुकती नहीं है।

बड़ा सवाल

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की सजा की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था की उस हकीकत को भी सामने लाता है, जहां कई बार फैसले आने में दशकों लग जाते हैं। सवाल यह भी है कि अगर न्याय में इतनी देरी हो, तो क्या उसे समय पर मिला न्याय कहा जा सकता है?

फिलहाल, 34 साल पुराने इस मामले में अदालत के फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कानून की पकड़ से बचना आसान नहीं है। वक्त बदल सकता है, उम्र ढल सकती है, लेकिन कानून का हिसाब एक दिन जरूर पूरा होता है।

Location :  New Delhi

Published :  3 June 2026, 7:40 PM IST