दान पेटी से बैंक खाते तक: करोड़ों के चढ़ावे का पूरा सफर, जानिए मंदिरों में पैसे की असली निगरानी कैसे होती है

भारत के मंदिरों में हर साल करोड़ों रुपये का दान आता है। श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस पैसे की गिनती, सुरक्षा, बैंक तक पहुंचने और खर्च होने की पूरी प्रक्रिया कैसी होती है? जानिए दान पेटी से बैंक खाते तक पहुंचने वाले चढ़ावे की पूरी कहानी, ऑडिट सिस्टम और पारदर्शिता से जुड़े सवाल।

Post Published By: Asmita Patel
Updated : 20 June 2026, 10:42 AM IST

New Delhi: भारत में मंदिर सिर्फ पूजा और आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों के बड़े केंद्र भी हैं। देश के छोटे गांवों के मंदिरों से लेकर बड़े तीर्थस्थलों तक हर दिन लाखों श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार दान करते हैं। कोई दान पेटी में नकद डालता है तो कोई सोना-चांदी, गहने या डिजिटल माध्यम से सहयोग करता है। यही छोटी-छोटी आस्थाएं मिलकर हर साल करोड़ों रुपये की धार्मिक अर्थव्यवस्था खड़ी कर देती हैं।

लेकिन जब किसी मंदिर की दान पेटी खुलती है और उसमें से लाखों-करोड़ों रुपये निकलते हैं तो सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि आखिर ये पैसा जाता कहां है? इसे कौन गिनता है? बैंक तक कैसे पहुंचाया जाता है? क्या हर रुपये का हिसाब रखा जाता है? और अगर कोई गड़बड़ी हो जाए तो जिम्मेदारी किसकी होती है? यह कहानी किसी एक मंदिर या किसी एक विवाद की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की है जिसके भरोसे श्रद्धालुओं की आस्था और करोड़ों रुपये का दान चलता है।

मंदिर का चढ़ावा अब सिर्फ धार्मिक नहीं, आर्थिक व्यवस्था भी है

पहले मंदिरों में दान का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ और धार्मिक कामों से जुड़ा माना जाता था, लेकिन समय के साथ मंदिरों की भूमिका काफी बढ़ गई है। आज दान से कई जगहों पर मंदिरों का संचालन, कर्मचारियों की सैलरी, धार्मिक आयोजन, अस्पताल, स्कूल, धर्मशाला और गरीबों के लिए भोजन जैसी व्यवस्थाएं चलती हैं। दान अब सिर्फ नकद तक सीमित नहीं है। लोग ऑनलाइन ट्रांसफर, UPI, QR कोड, सोना, चांदी और संपत्ति तक दान करते हैं। यानी मंदिरों में आने वाला पैसा एक बड़े वित्तीय सिस्टम का हिस्सा बन चुका है।

दान पेटी खुलने से पहले ही शुरू हो जाती है निगरानी

किसी भी बड़े मंदिर में दान पेटी को खोलना एक सामान्य प्रक्रिया नहीं होती। इसके लिए बाकायदा नियम बनाए जाते हैं। कई मंदिरों में दान पेटियों पर विशेष लॉक लगाए जाते हैं और उन्हें खोलने के लिए एक से ज्यादा लोगों की मौजूदगी जरूरी होती है। कई जगहों पर पेटी की सील नंबर तक दर्ज किए जाते हैं ताकि बाद में किसी तरह की गड़बड़ी की संभावना कम हो सके। दान पेटी खोलने के दौरान ट्रस्ट के अधिकारी, कर्मचारी, सुरक्षा टीम और कई बार बैंक प्रतिनिधि भी मौजूद रहते हैं। बड़े मंदिरों में पूरी प्रक्रिया CCTV कैमरों की निगरानी में होती है।

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करोड़ों की गिनती कैसे होती है?

एक समय था जब मंदिरों में दान की गिनती हाथ से की जाती थी। इसमें काफी समय लगता था और गलतियों की संभावना भी रहती थी। लेकिन अब बड़े मंदिरों में नोट गिनने वाली मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। नोटों को अलग-अलग मूल्य के अनुसार छांटा जाता है। सिक्कों को अलग किया जाता है और सोने-चांदी या गहनों की अलग सूची बनाई जाती है। हर चरण का रिकॉर्ड तैयार किया जाता है ताकि बाद में हिसाब मिलाया जा सके।

क्या कोई एक कर्मचारी पूरा पैसा संभाल सकता है?

व्यवस्था के अनुसार ऐसा नहीं होना चाहिए। बड़े संस्थानों में जिम्मेदारियों को अलग-अलग बांटा जाता है। इसे वित्तीय भाषा में Segregation of Duties कहा जाता है। मतलब एक टीम पेटी खोलती है, दूसरी टीम पैसे की गिनती करती है, तीसरी टीम रिकॉर्ड बनाती है और चौथी टीम बैंक में जमा करवाती है। इसका मकसद यह होता है कि किसी एक व्यक्ति के पास पूरी प्रक्रिया का नियंत्रण न रहे।

बैंक खाते तक पैसा कैसे पहुंचता है?

गिनती पूरी होने के बाद नकदी को सीलबंद बैग में रखा जाता है। इसके बाद जमा पर्ची तैयार होती है और अधिकृत कर्मचारी या कैश वैन के जरिए बैंक तक पैसा पहुंचाया जाता है। बैंक में जमा होने के बाद मंदिर के खाते में एंट्री होती है और पैसा आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाता है। बड़े मंदिर कोशिश करते हैं कि नकदी ज्यादा समय तक परिसर में न रखी जाए ताकि सुरक्षा जोखिम कम रहे।

डिजिटल दान से बदली तस्वीर

पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों में डिजिटल दान तेजी से बढ़ा है। UPI और ऑनलाइन भुगतान ने पूरी प्रक्रिया को आसान बना दिया है। डिजिटल भुगतान का सबसे बड़ा फायदा यह है कि हर लेनदेन का रिकॉर्ड बन जाता है। नकदी कम रहती है और ऑडिट करना भी आसान हो जाता है। हालांकि भारत में आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु नकद दान को प्राथमिकता देते हैं, इसलिए कैश मैनेजमेंट अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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क्या पूरे देश में एक जैसा नियम है?

यहीं से असली बहस शुरू होती है। भारत में सभी मंदिरों के लिए एक समान राष्ट्रीय कानून नहीं है। कुछ मंदिर राज्य सरकारों के बनाए बोर्ड के अधीन आते हैं, कुछ धार्मिक ट्रस्ट के रूप में चलते हैं और कुछ निजी संस्थाओं द्वारा संचालित होते हैं। इस वजह से अलग-अलग मंदिरों में ऑडिट, रिकॉर्ड रखने और पारदर्शिता की प्रक्रिया अलग हो सकती है।

ऑडिट क्यों जरूरी है?

ऑडिट का मतलब सिर्फ हिसाब जोड़ना नहीं होता। इसका मकसद यह पता लगाना होता है कि पैसा कहां से आया, कितना आया और कहां खर्च हुआ। ऑडिटर यह जांचता है कि रिकॉर्ड सही हैं या नहीं, बैंक बैलेंस से हिसाब मिल रहा है या नहीं और खर्च नियमों के अनुसार हुआ या नहीं। अगर कोई अंतर मिलता है तो सवाल उठाए जाते हैं और जांच की जा सकती है।

आस्था के साथ जवाबदेही भी जरूरी

सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नंदिनी गोरे का कहना है कि धार्मिक आस्था व्यक्तिगत विषय है, लेकिन सार्वजनिक धन का प्रबंधन सार्वजनिक जिम्मेदारी है। उनके मुताबिक बड़े धार्मिक न्यासों के लिए आय-व्यय की जानकारी सार्वजनिक करने, नियमित ऑडिट और पारदर्शी व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है। उनका मानना है कि पारदर्शिता से आस्था कमजोर नहीं होती, बल्कि संस्थाओं पर लोगों का भरोसा बढ़ता है।

चोरी और गड़बड़ी का खतरा कहां ज्यादा होता है?

विशेषज्ञों के अनुसार सबसे ज्यादा जोखिम तीन जगहों पर रहता है। पहला दान पेटी खुलने के समय, दूसरा पैसे की गिनती के दौरान और तीसरा बैंक तक पहुंचने से पहले। इसी वजह से इन चरणों में सुरक्षा और निगरानी सबसे ज्यादा रखी जाती है।

दुनिया भर में अपनाए जाते हैं ये तरीके

बड़ी धार्मिक संस्थाएं और गैर-लाभकारी संगठन कई सुरक्षा उपाय अपनाते हैं। इनमें दो लोगों की अनुमति से कैश खोलना, CCTV रिकॉर्डिंग, अचानक जांच, कर्मचारियों का रोटेशन और डिजिटल अकाउंटिंग जैसे तरीके शामिल हैं। तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल से आने वाले समय में ब्लॉकचेन रिकॉर्डिंग, AI आधारित अकाउंटिंग और रियल टाइम मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाएं भी बढ़ सकती हैं।

Location :  New Delhi

Published :  20 June 2026, 10:42 AM IST