
प्रतीकात्मक छवि (Source: Pinterest)
New Delhi: दिसंबर 2012 का निर्भया कांड दिल्ली के इतिहास की उन घटनाओं में शामिल है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। उस घटना के बाद सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई बड़े नियम और व्यवस्थाएं लागू करने की बात हुई। लेकिन अब चलती स्लीपर बस में 16 वर्षीय छात्रा के साथ हुई कथित सामूहिक दुष्कर्म की वारदात ने एक बार फिर वही सवाल सामने ला दिया है। क्या दिल्ली की बसों में महिलाएं और बच्चियां वास्तव में सुरक्षित हैं?
मौजूदा मामले में पुलिस ने चालक और कंडक्टर को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन गिरफ्तारी के बाद सबसे बड़ा सवाल केवल आरोपियों की भूमिका का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसने एक बस को लंबी दूरी तक बिना प्रभावी सुरक्षा निगरानी के चलने दिया।
DTC के मुताबिक उसकी बसों में IP-CCTV, पैनिक बटन और AVTS जैसे सुरक्षा उपकरण लगाए गए हैं। इसके अलावा 2026 में दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर DTC बसों में महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती और संवेदनशील रूटों की पहचान जैसे कदमों पर भी काम शुरू हुआ है।
फिर सवाल यह है कि नियम और तकनीक मौजूद होने के बावजूद निजी और स्लीपर बसों की निगरानी कैसे हो रही है? क्या हर बस के चालक-कंडक्टर का सत्यापन, वाहन की नियमित जांच, GPS और आपातकालीन सिस्टम की वास्तविक स्थिति सुनिश्चित की जा रही है?
यह मामला अकेला उदाहरण नहीं है। मई 2026 में बाहरी दिल्ली के नांगलोई इलाके में भी एक महिला ने बस में दो लोगों द्वारा यौन हिंसा का आरोप लगाया था। पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया था। जांच में यह भी सामने आया कि संबंधित बस पर दिल्ली और बिहार में कई यातायात चालान लंबित थे।
इससे यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि क्या केवल घटना के बाद गिरफ्तारी ही सुरक्षा व्यवस्था की सफलता मानी जाएगी?
फरवरी 2025 में दिल्ली में एक नाबालिग लड़की के परिवार ने स्कूल बस में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। पुलिस ने मामले में FIR दर्ज कर POCSO और BNS की धाराओं के तहत जांच शुरू की थी।
यानी सवाल सिर्फ रात में चलने वाली निजी बसों का नहीं है। स्कूल बस से लेकर सार्वजनिक परिवहन तक, बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा में निगरानी की पूरी श्रृंखला कितनी मजबूत है, यह जांचने की जरूरत है।
गृह मंत्रालय के अनुसार दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या 2023 में 13,208, 2024 में 13,195 और 2025 में 12,458 रही। बच्चों के खिलाफ दर्ज अपराध भी 2025 में 7,413 रहे।
NCRB के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ 13,396 मामले दर्ज हुए थे और राजधानी 19 बड़े शहरों में सबसे अधिक ऐसे मामलों वाला शहर रही।
हालांकि आंकड़ों में कमी आई है, लेकिन एक भी बच्ची का सार्वजनिक परिवहन में असुरक्षित होना व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुरक्षा उपकरण लगाए जाने के बाद उनकी नियमित जांच कौन करता है? निजी बसों में CCTV और पैनिक बटन वास्तव में काम कर रहे हैं या केवल कागजों में दर्ज हैं? बसों के अंदर पर्दे या ऐसी व्यवस्था क्यों मौजूद रहती है जिससे बाहर से अंदर की गतिविधियां दिखाई न दें? चालक और कंडक्टर के सत्यापन तथा उनके रिकॉर्ड की नियमित निगरानी कितनी प्रभावी है?
इन सवालों का जवाब केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं मिलेगा। परिवहन विभाग, पुलिस, बस मालिकों और ऑपरेटरों सभी की जवाबदेही तय करनी होगी।
निर्भया कांड के बाद सुरक्षा के लिए कई बदलाव हुए। लेकिन मौजूदा घटना यह याद दिलाती है कि कानून और तकनीक बनाने के साथ-साथ उनका जमीन पर पालन और स्वतंत्र निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।
दिल्ली में महिलाओं और बच्चियों को सुरक्षित यात्रा का भरोसा तभी मिलेगा, जब बस में बैठने के बाद उन्हें यह डर न हो कि जिस व्यक्ति को उन्हें सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाना है, वही उनकी सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।
यही इस घटना का सबसे बड़ा सवाल है 14 साल बाद भी अगर चलती बस में एक बच्ची सुरक्षित नहीं है, तो आखिर सुरक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी कहां है?
Location : New Delhi
Published : 31 August 2026, 8:35 AM IST