आप Gen-Z नहीं…सौरव दास और आशुतोष रंका से हाई कोर्ट ने क्यों पूछी उम्र? जानिए सुनवाई की पूरी कहानी

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सौरव दास और आशुतोष रंका से जुड़े मामले में बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान उम्र और Gen-Z की परिभाषा को लेकर दिलचस्प टिप्पणी सामने आई।

Updated : 21 October 2026, 4:12 PM IST
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नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सौरव दास और आशुतोष रंका से जुड़े मामले में बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान उम्र और Gen-Z की परिभाषा को लेकर दिलचस्प टिप्पणी सामने आई। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने दोनों नेताओं की उम्र पूछी और जवाब मिलने के बाद कहा कि वे Gen-Z नहीं हैं। हालांकि, सुनवाई का असली कानूनी पहलू उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका और उसे सुनवाई के दौरान वापस लेने से जुड़ा रहा। अदालत ने याचिका के लिए अपनाए गए कानूनी रास्ते पर सवाल उठाए और पहले संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध उपाय अपनाने की बात कही।

उम्र पूछकर कोर्ट ने क्यों कहा- आप Gen-Z नहीं हैं?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील अभिक चिमनी से न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने सौरव दास और आशुतोष रंका की उम्र पूछी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सौरव दास की उम्र 27 वर्ष और आशुतोष रंका की उम्र 31 वर्ष बताई गई। कुछ रिपोर्टों में रंका की उम्र 32 वर्ष भी लिखी गई है।

उम्र बताने के बाद अदालत ने Gen-Z की परिभाषा पर सवाल किया। जब अदालत को बताया गया कि इस पीढ़ी में आम तौर पर 1997 के बाद जन्मे लोगों को शामिल किया जाता है, तो न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि दोनों उस श्रेणी में नहीं आते।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई, जब अदालत CJP नेताओं की हिरासत और उनके संगठन की गतिविधियों से जुड़े कानूनी सवालों पर सुनवाई कर रही थी।

प्रदर्शन के मुद्दे बदलने पर भी अदालत ने उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने CJP नेताओं के प्रदर्शन के मुद्दों और संगठन की भूमिका पर भी सवाल किए। रिपोर्टों के अनुसार, न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि शुरुआत में प्रदर्शन छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित था, लेकिन बाद में आंदोलन के मुद्दे बदलते दिखाई दिए।

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि संगठन की पहचान, उद्देश्य और गतिविधियों को लेकर सवाल क्यों नहीं उठने चाहिए। यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान अदालत की मौखिक टिप्पणियों का हिस्सा थी। इसे किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

अदालत ने सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था के महत्व पर भी जोर दिया। जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित न किए जाने के बाद वहां जाने और कथित तौर पर निर्धारित शर्तों का उल्लंघन करने को लेकर भी सवाल उठाए गए।

हिरासत बढ़ाने के आदेश को क्यों दी गई थी चुनौती?

सौरव दास और आशुतोष रंका ने विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के 19 अक्टूबर के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के जरिए उनकी न्यायिक हिरासत दो दिन बढ़ाकर 21 अक्टूबर तक कर दी गई थी।

दोनों नेताओं के खिलाफ कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की निवारक धाराओं के तहत की गई थी। मामले में 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर क्षेत्र में कथित तौर पर प्रवेश करने और प्रदर्शन से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से हिरासत बढ़ाने की वैधता पर सवाल उठाए गए। उनके वकील ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट के आदेश में हिरासत जारी रखने के आधारों को लेकर सवाल हैं। अदालत ने दूसरी ओर यह पूछा कि जब जमानत बांड और शांति बनाए रखने से जुड़ी शर्तों के उल्लंघन का आरोप है, तो संबंधित कानूनी प्रक्रिया का पालन किस तरह किया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट से याचिका वापस लेने का फैसला क्यों हुआ?

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका क्यों दायर की गई, जबकि दूसरे कानूनी उपाय उपलब्ध हो सकते हैं।

अदालत ने संकेत दिया कि पहले विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित कार्यवाही का परिणाम देखा जाए और जरूरत पड़ने पर उपयुक्त अपीलीय मंच का रुख किया जाए। इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रंका की ओर से याचिका वापस लेने का अनुरोध किया गया।

अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति दी और स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। इसका अर्थ यह है कि याचिका वापस लिया जाना अपने आप में दोनों नेताओं के आरोपों या हिरासत की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं है।

अब आगे क्या होगा?

इस घटनाक्रम के बाद दोनों नेताओं के मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष चल रही कार्यवाही और हिरासत से जुड़े आदेश पर निर्भर करेगा। यदि उन्हें वहां से राहत नहीं मिलती है, तो वे कानून के तहत उपलब्ध उचित मंच पर आगे चुनौती दे सकते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट की सुनवाई ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि विरोध-प्रदर्शन के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था और निवारक हिरासत से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन किस तरह किया जाना चाहिए।

Gen-Z को लेकर अदालत की टिप्पणी चर्चा का विषय जरूर बनी, लेकिन इस मामले का वास्तविक कानूनी महत्व हिरासत बढ़ाने के आदेश, शांति बांड से जुड़े आरोपों और उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपायों पर केंद्रित है।

Location :  New Delhi

Published :  21 October 2026, 4:12 PM IST

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