होलिका दहन के लिए पहले लकड़ी कैसे जुटाई जाती थी और अब इसमें क्या बदलाव आया है? जानिए परंपरा, पर्यावरण और ग्रीन होलिका मूवमेंट से जुड़ी पूरी जानकारी और कैसे बदल रहा है यह सदियों पुराना अनुष्ठान।

होलिका दहन (img source: google)
New Delhi: Holika Dahan सदियों से बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक रहा है। होली से एक दिन पहले होने वाला यह अनुष्ठान सामाजिक एकता और आस्था का बड़ा उदाहरण माना जाता है। लेकिन बदलते समय के साथ एक सवाल अक्सर उठता है कि होलिका दहन के लिए लकड़ी पहले कैसे जुटाई जाती थी और आज इसमें क्या बदलाव आया है?
ग्रामीण भारत में होलिका दहन की तैयारी किसी एक परिवार की नहीं, पूरे गांव की जिम्मेदारी मानी जाती थी। बच्चे और युवा घर-घर जाकर सूखी लकड़ियां और उपले इकट्ठा करते थे। किसान अपनी खेतों से निकली सूखी टहनियां और फसल के अवशेष दान में देते थे।
कई जगहों पर लोग सालभर सूखी लकड़ी अलग से जमा करके रखते थे ताकि त्योहार के समय पेड़ काटने की जरूरत न पड़े। यह प्रक्रिया केवल धार्मिक रस्म नहीं थी। इससे गांव में आपसी सहयोग और मेल-जोल बढ़ता था। हर घर की भागीदारी से एक सामूहिक आयोजन होता था, जिससे सामाजिक जुड़ाव मजबूत होता था। किसी एक व्यक्ति या परिवार पर आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ता था।
समय के साथ आबादी बढ़ी, शहरों का विस्तार हुआ और जंगलों पर दबाव बढ़ा। ऐसे में होलिका दहन के लिए लकड़ी की व्यवस्था अब एक नई बहस का विषय बन गई है। कई राज्यों में प्रशासन हरे पेड़ काटने पर सख्त रोक लगाता है। अधिकारियों की ओर से साफ निर्देश दिए जाते हैं कि केवल सूखी लकड़ी या जैविक कचरे का ही उपयोग किया जाए।
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पर्यावरणविद भी “ग्रीन होलिका” का संदेश दे रहे हैं। उनका कहना है कि परंपरा का सम्मान जरूरी है, लेकिन प्रकृति की रक्षा उससे भी ज्यादा अहम है। शहरी इलाकों में अब गोबर के कंडों, पुराने फर्नीचर की लकड़ी या सीमित मात्रा में लकड़ी से प्रतीकात्मक होलिका दहन का चलन बढ़ रहा है। कई सोसायटियों में छोटी और नियंत्रित अग्नि जलाकर रस्म निभाई जाती है, जिससे प्रदूषण कम हो।
पर्यावरण-अनुकूल होलिका दहन को बढ़ावा देने के लिए स्कूल, सामाजिक संगठन और युवा समूह सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। कई जगहों पर एक ही स्थान पर सामूहिक होलिका आयोजित की जाती है, ताकि अलग-अलग जगहों पर ज्यादा लकड़ी न जलाई जाए।
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कुछ संस्थाएं होलिका दहन के बाद पेड़ लगाने की शपथ भी दिलाती हैं। इसका मकसद यह संदेश देना है कि परंपरा निभाने के साथ प्रकृति की भरपाई भी जरूरी है। सीमित संसाधनों का उपयोग और सूखी सामग्री का चयन अब जागरूक समाज की पहचान बनता जा रहा है।