रविवार को देवघर के किन्नर समाज ने मंगलमुखी धाम में होली मिलन समारोह का भव्य आयोजन किया। इस दौरान सामाजिक सरोकार और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत संगम देखा गया।

देवघर में अनोखी होली की परंपरा
Deoghar: होली का त्योहार शुरु होते ही झारखंड के देवघर का वातावरण फगुआ की खुशबू से महक उठा है। नगर की गलियों में अबीर-गुलाल की आभा और लोकगीतों की मधुर तान सुनाई देने लगी है। इसी उल्लासपूर्ण परिवेश में रविवार को देवघर के किन्नर समाज ने मंगलमुखी धाम में होली मिलन समारोह का भव्य आयोजन किया। इस दौरान सामाजिक सरोकार और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत संगम भी देखा गया।
समारोह में झारखंड की किन्नर महामंडलेश्वर राजेश्वरी नंद गिरि ने समाज के साथ फूलों और गुलाल से सूखी होली खेली। रंगों की इस पावन अठखेलियों के बीच उन्होंने जल संरक्षण का गंभीर संदेश भी दिया।
उल्लास और उत्तरदायित्व संगम
समारोह में फाग-गीतों की रसधारा बही, पारंपरिक लोकधुनों पर किन्नर समाज ने ठुमके लगाए और बसंत ऋतु का अभिनंदन किया। उल्लास और उत्तरदायित्व का यह संगम देवघरवासियों के लिए एक प्रेरणास्पद उदाहरण बनकर उभरा।
राजेश्वरी नंद गिरि ने कहा कि देवघर तेजी से जल-संकट की ओर बढ़ रहा है, शहर ड्राई जोन की स्थिति के निकट है और गर्मी की आहट के साथ जल-संकट गहराने की आशंका है। ऐसे में गीले रंगों से परहेज़ कर सूखी होली मनाना समय की पुकार है।
7, 8 और 9 मार्च को होगा भव्य महायज्ञ
इसी अवसर पर मार्च माह में होने वाले भव्य धार्मिक आयोजन की जानकारी भी साझा की गई। झारखंड किन्नर महामंडलेश्वर माता राजनंदनी ने बताया कि आगामी 7, 8 और 9 मार्च को बंधा स्थित परिसर में भव्य महायज्ञ का आयोजन किया जाएगा। इस तीन दिवसीय आध्यात्मिक अनुष्ठान में प्रदेशभर से संत-महात्मा, बुद्धिजीवी एवं श्रद्धालु सहभागिता करेंगे।
कार्यक्रम के आयोजनकर्ता महंत अजीत कुमार सिंह ने जानकारी दी कि इस महायज्ञ में मुख्य अतिथि के रूप में प्रख्यात किन्नर संत लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की गरिमामयी उपस्थिति रहेगी। उनके साथ समाज के अनेक गणमान्य व्यक्तियों के आगमन से आयोजन की गरिमा और भी बढ़ेगी।
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धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से विख्यात देवघर सदैव आध्यात्मिक आयोजनों के प्रति विशेष आस्था रखता है। ऐसे में होली के रंगों के बीच महायज्ञ की घोषणा ने जनमानस में उत्साह की नई लहर पैदा कर दी है।
किन्नर समाज ने जहां एक ओर सूखी होली खेलकर जल संरक्षण का व्यावहारिक संदेश दिया, वहीं दूसरी ओर महायज्ञ की घोषणा कर आध्यात्मिक चेतना का दीप भी प्रज्वलित किया।
फगुनाहट की इस बेला में देवघर ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि यहां रंग केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि विचारों में भी घुलते हैं—और संदेश केवल शब्दों से नहीं, बल्कि आचरण से दिए जाते हैं।