
भारतीय मूल की नावी पिल्लई को मिला सम्मान (Img: Dynamite News)
New Delhi News: नोबेल शांति पुरस्कार 2026 का ऐलान हो गया है। दक्षिण अफ्रीका की जानी-मानी न्यायविद और भारतीय तमिल मूल की नवनेथम ‘नावी’ पिल्लई को इस साल के सम्मान के लिए चुना गया है। उन्हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने में लंबे समय तक दिए गए योगदान के लिए यह पुरस्कार दिया गया है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इस साल भी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला। पिल्लई का नाम सामने आने के बाद उनके संघर्ष और न्याय के लिए किए गए काम की चर्चा तेज हो गई है।
नावी पिल्लई का जन्म 1941 में दक्षिण अफ्रीका में एक तमिल मूल के परिवार में हुआ था। उनका बचपन ऐसे दौर में बीता, जब देश में रंगभेद की नीति के कारण गैर-श्वेत लोगों को भेदभाव का सामना करना पड़ता था। इन हालात ने उनके जीवन और काम पर गहरा असर डाला। पिल्लई ने कानून की पढ़ाई की और वकील के रूप में उन लोगों की मदद की, जो रंगभेद के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। उन्होंने नेल्सन मंडेला सहित रंगभेद विरोधी आंदोलन से जुड़े लोगों की कानूनी लड़ाई में योगदान दिया। आगे चलकर वह दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में जज बनीं। उनकी यह उपलब्धि ऐसे समय में खास थी, जब देश में नस्लीय समानता के लिए लंबा संघर्ष चल रहा था।
नावी पिल्लई के करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रवांडा के अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में जज के रूप में उनकी भूमिका रही। रवांडा में 1994 के नरसंहार के बाद जिम्मेदार लोगों को न्याय के दायरे में लाना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने बड़ी चुनौती थी। इस न्यायाधिकरण में पिल्लई ने ऐसे मामलों पर काम किया, जिनसे युद्ध अपराधों और यौन हिंसा के लिए जवाबदेही तय करने के कानूनी प्रयासों को मजबूती मिली। उनके कार्यकाल से जुड़ा एक ऐतिहासिक फैसला यह स्थापित करने में महत्वपूर्ण रहा कि कुछ परिस्थितियों में यौन हिंसा को नरसंहार के एक तरीके के रूप में भी देखा जा सकता है।
उनका काम इस बात की याद दिलाता है कि युद्ध और हिंसा के दौरान महिलाओं तथा अन्य कमजोर वर्गों के खिलाफ होने वाले अपराधों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ये भी पढ़ें- जंतर-मंतर प्रदर्शन से पहले सख्त हुई महाराष्ट्र पुलिस: ट्रेन से लेकर घर तक संदिग्धों पर कड़ी पैनी नजर
पिल्लई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। वह 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त रहीं। इस भूमिका में मानवाधिकारों के उल्लंघन, भेदभाव और संघर्ष से प्रभावित लोगों के मुद्दों पर उनकी आवाज महत्वपूर्ण रही। उनके काम का मुख्य आधार यह विचार रहा कि किसी देश की ताकत या किसी व्यक्ति का पद कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए। युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार जैसे मामलों में निष्पक्ष जांच और जवाबदेही जरूरी है। उनके लंबे न्यायिक अनुभव ने अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था में उनकी पहचान मजबूत की।
नावी पिल्लई ने इजराइल-फलस्तीन संघर्ष और गाजा में सैन्य कार्रवाई को लेकर भी मानवाधिकारों के सवाल उठाए हैं। वह उन अंतरराष्ट्रीय आवाजों में शामिल रही हैं, जो संघर्ष के दौरान नागरिकों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर जोर देती हैं। उनका दृष्टिकोण इस बात पर आधारित है कि शांति केवल लड़ाई रुक जाने से नहीं आती। इसके लिए पीड़ितों को न्याय मिलना, अपराधों की निष्पक्ष जांच होना और भविष्य में ऐसे अत्याचार रोकने के उपाय करना भी जरूरी है।
ये भी पढ़ें- INDIA Bloc Meeting: रात 8 बजे राष्ट्रपति से मिलेंगे विपक्षी नेता, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सौपेंगे ज्ञापन
नावी पिल्लई के काम का सबसे अहम पहलू है न्याय को शांति से जोड़ना। उन्होंने अपने करियर में रंगभेद के खिलाफ कानूनी संघर्ष से लेकर अंतरराष्ट्रीय अदालतों और संयुक्त राष्ट्र तक काम किया। उनके प्रयासों ने युद्ध अपराधों और मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में जवाबदेही की जरूरत को सामने रखा।
उनका सम्मान ऐसे समय में आया है, जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और हिंसा को लेकर चिंता बनी हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार नोबेल शांति पुरस्कार पाने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं। लेकिन 2026 के पुरस्कार के लिए नावी पिल्लई का चयन हुआ है। इस फैसले ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति, न्याय और मानवाधिकारों के महत्व को चर्चा में ला दिया है।
Location : New Delhi
Published : 9 October 2026, 2:41 PM IST