मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच साइबर जंग भी तेज हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान से जुड़े हैकर्स इंटरनेट से जुड़े CCTV और IP कैमरों को निशाना बना रहे हैं, ताकि मिसाइल हमलों से पहले इलाके की निगरानी और बाद में नुकसान का आकलन किया जा सके।

Iran Israel War Special Story
New Delhi: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अब युद्ध का एक नया और खतरनाक रूप सामने आ रहा है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के साथ-साथ साइबर जंग भी तेज हो गई है। साइबर सिक्योरिटी एजेंसी Check Point Research की ताजा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ईरान से जुड़े साइबर एक्टर्स ने बड़े पैमाने पर इंटरनेट से जुड़े IP कैमरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। इन कैमरों को हैक करने का मकसद सिर्फ जासूसी तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इनका इस्तेमाल संभावित सैन्य हमलों से पहले इलाके की निगरानी और हमले के बाद नुकसान का आकलन करने के लिए भी किया जा सकता है।
कैमरों के जरिए युद्ध की तैयारी
रिपोर्ट के अनुसार, इंटरनेट से जुड़े CCTV और IP कैमरों तक पहुंच बनाकर हमलावर जमीन पर हो रही गतिविधियों को लाइव देख सकते हैं। इससे उन्हें टार्गेट एरिया की लोकेशन, सुरक्षा व्यवस्था और आसपास की गतिविधियों का सटीक अंदाजा लगाने में मदद मिलती है। सैन्य भाषा में इसे Battle Damage Assessment यानी BDA कहा जाता है। इसके जरिए किसी मिसाइल या ड्रोन हमले के बाद यह आकलन किया जाता है कि लक्ष्य को कितना नुकसान पहुंचा और आगे किसी दूसरे हमले की जरूरत है या नहीं।
कई देशों में कैमरों को बनाया गया निशाना
चेकप्वाइंट रिसर्च के डेटा के मुताबिक, 28 फरवरी के बाद IP कैमरों को स्कैन करने और उन तक पहुंचने की कोशिशों में अचानक तेजी देखी गई। यह वही समय था जब मिडिल ईस्ट में सैन्य तनाव बढ़ रहा था और कई जगहों पर मिसाइल गतिविधियां भी सामने आई थी। रिपोर्ट में बताया गया कि यह गतिविधियां सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं थीं। इजराइल, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत, लेबनान और साइप्रस जैसे कई देशों में इंटरनेट से जुड़े कैमरों को निशाना बनाया गया।
कैसे किया जाता है कैमरा हैक?
साइबर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, दुनिया भर में लाखों CCTV और IP कैमरे इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। यही कनेक्टिविटी उन्हें हैकिंग के लिए आसान टार्गेट बना देती है। हमलावर सबसे पहले इंटरनेट पर ऐसे कैमरों को स्कैन करते हैं जो पब्लिक नेटवर्क से जुड़े होते हैं। इसके बाद वे उन कैमरों में मौजूद पुराने सॉफ्टवेयर या सिक्योरिटी कमजोरियों का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं।
इस अभियान में खास तौर पर Hikvision और Dahua जैसे लोकप्रिय कैमरा ब्रांड्स को निशाना बनाया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि इन कैमरों में मौजूद कई जानी-पहचानी तकनीकी कमजोरियों जैसे CVE-2017-7921, CVE-2021-36260 और CVE-2021-33044 का फायदा उठाने की कोशिश की गई। अगर यह हमला सफल हो जाए तो हैकर्स कैमरे के लाइव वीडियो फीड तक पहुंच सकते हैं।
पहचान छिपाने के लिए VPN और सर्वर का इस्तेमाल
रिसर्च में यह भी सामने आया कि इन साइबर गतिविधियों के दौरान हमलावरों ने अपनी असली पहचान छिपाने के लिए कई तकनीकों का इस्तेमाल किया। रिपोर्ट के अनुसार Mullvad, ProtonVPN, Surfshark और NordVPN जैसे VPN सर्विसेज के एग्जिट नोड्स का इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा कई वर्चुअल प्राइवेट सर्वर यानी VPS का भी उपयोग किया गया, जिससे हमलावरों की असली लोकेशन को ट्रेस करना काफी मुश्किल हो जाता है।
पहले भी दिख चुका है ऐसा पैटर्न
रिसर्चर्स के मुताबिक इसी तरह की कैमरा स्कैनिंग गतिविधियां जनवरी में भी देखी गई थीं। उस समय ईरान में बड़े विरोध प्रदर्शन चल रहे थे और क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ रहा था। उसी दौरान संभावित हमले की आशंका के बीच ईरान ने कुछ समय के लिए अपना एयरस्पेस भी बंद कर दिया था।
आधुनिक युद्ध का बदलता स्वरूप
साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि आधुनिक युद्ध अब सिर्फ सीमाओं पर सैनिकों के बीच नहीं लड़े जा रहे। इसमें साइबर हमले, डिजिटल जासूसी, डेटा एनालिसिस और इंटरनेट से जुड़े उपकरणों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। स्मार्ट सिटी और स्मार्ट होम जैसी तकनीकों के विस्तार के साथ यह खतरा और बढ़ जाता है।
अगर इन डिवाइस की सुरक्षा मजबूत न हो तो वही CCTV कैमरे जो सुरक्षा के लिए लगाए गए हैं, युद्ध में दुश्मन की आंखें बन सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर लोग कैमरे लगाते समय उनकी आंतरिक साइबर सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान नहीं देते, जो भविष्य में बड़ी सुरक्षा चुनौती बन सकती है।