सिनेमाघरों में चलने से पहले ही क्यों चूका ‘Ikka’? क्लाइमेक्स का ट्विस्ट भी नहीं भर पाया कहानी का खालीपन, पढ़ें रिव्यू

सनी देओल और अक्षय खन्ना स्टारर 'इक्का' एक कोर्टरूम ड्रामा और पारिवारिक भावनाओं का मिश्रण है, जो कमजोर स्क्रीनप्ले के कारण दर्शकों पर गहरा असर छोड़ने में नाकाम रहती है। फिल्म में वकील अर्जुन मेहरा की बेटी की बीमारी और एक हाई-प्रोफाइल केस की कहानी है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 10 July 2026, 4:43 PM IST

Mumbai: ताश के खेलों में 'Ikka' को सबसे ताकतवर पत्तों में से एक माना जाता है, लेकिन इसी नाम वाली फिल्म दर्शकों पर वैसा असर छोड़ने में नाकाम रहती है। कोर्टरूम ड्रामा और इमोशनल फैमिली स्टोरी का कॉम्बो होने के बावजूद, कमजोर स्क्रीनप्ले और ठीक से न गढ़े गए किरदारों की वजह से फिल्म अपनी पकड़ खो देती है, भले ही इसमें बड़े स्टार्स हों। कहानी में कई जगहों पर इंटरेस्ट पैदा करने की कोशिश की गई है, लेकिन उसका असर बहुत कम समय के लिए ही रहता है।

बेटी की बीमारी और एक हाई-प्रोफाइल केस

(Photo Credit: IMDb)

फिल्म मशहूर वकील अर्जुन मेहरा के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें 'Ikka' कहा जाता है क्योंकि उनमें आखिरी मिनट में केस का पासा पलटने की काबिलियत है। उनकी जिंदगी में तब मोड़ आता है जब उनकी बेटी समायरा को एक गंभीर बीमारी का पता चलता है। इसी बीच, एक रसूखदार बिजनेसमैन के बेटे पर हत्या की कोशिश का आरोप लगता है और अर्जुन के सामने एक ऐसा केस आता है जो उनकी पर्सनल लाइफ से गहराई से जुड़ा होता है।

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बेटी के इलाज के लिए पैसों की जरूरत और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते, वह केस स्वीकार कर लेते हैं, जिससे कोर्ट में कानूनी लड़ाई शुरू होती है। यह टकराव ही कहानी का मुख्य हिस्सा है, लेकिन कहानी में उस गहराई की कमी है जो दर्शकों को सच में बांध सके।

स्क्रीनप्ले में कमियां

फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसकी स्क्रिप्ट है। कई अहम घटनाओं के पीछे की वजहें दर्शकों को साफ नहीं हो पातीं। किरदारों के रिश्ते, पुरानी दुश्मनी और कहानी के बड़े मोड़ बिना सही संदर्भ के दिखाए गए हैं, जिससे कहानी अधूरी और जल्दबाजी में लिखी हुई लगती है।

जांच की प्रक्रिया और पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। आधुनिक तकनीक और जांच के सामान्य तरीकों को नजरअंदाज करने से कोर्टरूम ड्रामा की विश्वसनीयता कम हो जाती है। इसके अलावा, कोर्ट में पेश किए गए सबूत और गवाह उम्मीद के मुताबिक सस्पेंस पैदा नहीं कर पाते।

इमोशनल तौर पर जुड़ने में नाकाम

(Photo Credit: IMDb)

हालांकि फिल्म सेंसिटिव मुद्दों जैसे बीमार बेटी, पारिवारिक जिम्मेदारियां और महिला के खिलाफ कथित अपराध को उठाती है, लेकिन इसका इमोशनल असर सीमित ही रहता है। कई सीन्स में इमोशन जगाने की कोशिश की गई है, लेकिन किरदारों के साथ गहरा कनेक्शन नहीं बन पाता। फिल्म के क्लाइमेक्स में एक बड़ा मोड़ आता है, लेकिन वह बहुत देर से आता है; तब तक फिल्म काफी हद तक अपनी तफ्तार और असर खो चुकी होती है।

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कलाकारों की दमदार एक्टिंग

एक मंझे हुए कलाकार के तौर पर, सनी देओल ने अपने किरदार को बहुत ईमानदारी से निभाया है। एक वकील के तौर पर उनका काम दमदार है, लेकिन कमजोर लेखन की वजह से उनकी परफॉर्मेंस पूरी तरह से निखर नहीं पाती। अक्षय खन्ना ने सधी हुई एक्टिंग की है, जबकि कम स्क्रीन टाइम के बावजूद दीया मिर्जा का काम स्वाभाविक लगता है। तिलोत्तमा शोम ने भी अच्छा काम किया है, हालांकि उनके किरदार को और बेहतर ढंग से गढ़ा जा सकता था।

Location :  Mumbai

Published :  10 July 2026, 4:43 PM IST