मेरठ के कपसाड़ में बेटी को बचाने के लिए मां ने अपनी जान गंवा दी। यह घटना उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों की भयावह तस्वीर पेश करती है। सवाल यह है कि आखिर कब सुरक्षित होंगी प्रदेश की बेटियां?

क्या क्राइम स्टेट में बन रहा यूपी?
Lucknow: उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। कभी उन्नाव, कभी हाथरस, कभी कानपुर और अब मेरठ। ज़िले बदल जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन घटनाओं की तस्वीर एक जैसी ही रहती है। मेरठ के सरधना थाना क्षेत्र के कपसाड़ गांव में जो हुआ, उसने एक बार फिर प्रदेश की कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक मां ने अपनी बेटी की इज़्ज़त और जान बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।
कपसाड़ गांव निवासी सुनीता देवी अपनी बेटी रूबी के साथ खेत की ओर जा रही थीं। यह रोज़मर्रा का रास्ता था, लेकिन किसी को अंदेशा नहीं था कि यह सफर मौत में बदल जाएगा। रजबहे की पटरी के पास गांव के ही पारस सोम, सुनील और उनके कुछ साथी कार लेकर पहुंचे और रूबी को जबरन अगवा करने की कोशिश की। मां ने जब यह देखा तो वह बेटी के सामने ढाल बनकर खड़ी हो गईं।
सुनीता देवी ने पूरी ताकत से आरोपियों का विरोध किया। मां की ममता ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, लेकिन आरोपी पारस सोम ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं। उसने फरसे से सुनीता पर हमला कर दिया। लहूलुहान हालत में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। एक मां बेटी को बचाते-बचाते हमेशा के लिए खामोश हो गई।
यह घटना कोई पहली नहीं है। उन्नाव, हाथरस, कानपुर और अब मेरठ हर जगह कहानी लगभग एक जैसी है। कहीं बेटियों के साथ दरिंदगी, कहीं मां-बाप की जान जाना। प्रदेश में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे जरूर गूंजते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे उलट नजर आती है। सवाल यह है कि आखिर कब तक बेटियों की इज़्ज़त की कीमत उनके परिवारों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी?
स्थानीय लोगों का कहना है कि आरोपी पहले से ही दबंग किस्म के थे और गांव में उनका डर बना रहता था। छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा और हिंसा उनकी आदत में शामिल थी। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि अगर समय रहते सख्ती होती, तो शायद एक मां की जान बचाई जा सकती थी।
प्रदेश सरकार महिला सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन घटनाएं उन दावों को खोखला साबित कर रही हैं। क्या पुलिस की गश्त नाकाफी है? क्या अपराधियों के मन से कानून का डर खत्म हो चुका है? या फिर सिस्टम की ढिलाई ही ऐसे अपराधों को बढ़ावा दे रही है?
कपसाड़ गांव की घटना के बाद पूरे इलाके में डर और गुस्से का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपनी बेटियों को अकेले बाहर भेजने से डरने लगे हैं। हर मां-बाप के मन में यही सवाल है- क्या उनकी बेटी सुरक्षित है?
बृहस्पतिवार सुबह सरधना थाना क्षेत्र के कपसाड़ गांव में सुनीता देवी अपनी बेटी रूबी के साथ खेत की ओर जा रही थीं। रजबहे की पटरी के पास आरोपी पारस सोम, सुनील और उनके कुछ साथी कार लेकर पहुंचे। आरोपियों ने रूबी को अगवा करने का प्रयास किया। जब सुनीता ने विरोध किया तो पारस ने फरसे से हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल सुनीता की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई।