
इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा आदेश (Img: Pinterest)
Prayagraj: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गैंग-रेप के एक पुराने मामले में अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया कि जो व्यक्ति अपराध करने में मदद करता है, उसे भी मुख्य अपराधी (जिसने रेप किया) के बराबर ही दोषी माना जाता है। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई आरोपी पीड़िता को रोकता है, पहरा देता है या किसी भी तरह से अपराध करने में मदद करता है, तो उसकी जिम्मेदारी मुख्य आरोपी के बराबर ही होती है।
यह मामला रामपुर जिले के टांडा पुलिस स्टेशन इलाके का है। 1984 में दर्ज इस मामले में आरोप था कि दो महिलाएं सूखी पत्तियां इकट्ठा करने जंगल गई थीं, तभी पांच लोगों ने उन्हें घेर लिया। कुछ आरोपियों ने महिलाओं को रोककर रखा, दो ने रेप किया और एक पास ही पहरा दे रहा था। जब महिलाओं ने शोर मचाया, तो उनके परिवार वाले मौके पर पहुंच गए जिससे सभी आरोपी भाग गए।
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ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषी ठहराया था और उन्हें पांच साल की सजा सुनाई थी। इस फ़ैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की गई थी। अपील करने वालों ने दलील दी कि चूंकि उन्होंने खुद रेप नहीं किया था, इसलिए उन्हें इस अपराध का दोषी नहीं माना जाना चाहिए। यह भी कहा गया कि उनमें से एक आरोपी सिर्फ पहरा दे रहा था।
जस्टिस संतोष राय की अध्यक्षता वाली सिंगल-जज बेंच ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 34 'साझा आपराधिक इरादे' के सिद्धांत पर आधारित है। अगर सभी आरोपी मिलकर कोई अपराध करते हैं, तो हर व्यक्ति पूरे अपराध के लिए समान रूप से जिम्मेदार होता है। कोर्ट ने माना कि पीड़िता को रोकना या पहरा देना आपराधिक योजना का एक अहम हिस्सा था।
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सभी तथ्यों और सबूतों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने दोनों अपीलें खारिज कर दीं और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखा। इस फैसले को साझा आपराधिक इरादे वाले मामलों के लिए एक अहम कानूनी नजीर के तौर पर देखा जा रहा है।
Location : Prayagraj
Published : 31 July 2026, 12:17 PM IST