11 साल बाद दर्ज दहेज उत्पीड़न के मामले में अदालत ने सवालों की झड़ी लगा दी। साक्ष्यों की कमी और शिकायत में देरी के चलते फौजी पति को राहत मिली, फैसले ने कानून के संतुलित इस्तेमाल पर नई बहस छेड़ दी।

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Almora: दहेज उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े एक मामले में जिला न्यायालय का फैसला इन दिनों चर्चा में है। अदालत ने न सिर्फ महिला के आरोपों पर सवाल खड़े किए, बल्कि पूरे मामले की टाइमिंग और साक्ष्यों की कमी को आधार बनाकर फौजी पति को बरी कर दिया। यह फैसला ऐसे वक्त में आया है, जब दहेज उत्पीड़न के मामलों में कानून का सख्त इस्तेमाल और उसके दुरुपयोग- दोनों पर बहस लगातार तेज होती जा रही है।
11 साल बाद उठे आरोप, अदालत ने पूछा बड़ा सवाल
यह मामला अल्मोड़ा निवासी एक महिला से जुड़ा है, जिसने अपने पति पर दहेज के लिए मारपीट और उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे। महिला का कहना था कि उसकी शादी जून 2011 में हुई थी और शादी के तुरंत बाद से ही उसे दहेज को लेकर प्रताड़ित किया जाने लगा। पति सेना में जवान है और पोस्टिंग के चलते वह उसे अपने साथ हिसार, हरियाणा और बाद में दिल्ली लेकर गया। दोनों कुछ समय हल्द्वानी में किराए के मकान में भी रहे, जहां उनके दो बच्चे भी हुए।
2023 में दर्ज हुई शिकायत, पुलिस ने दर्ज किया मुकदमा
महिला ने जनवरी 2023 में न्यायालय में प्रार्थनापत्र देकर न्याय की गुहार लगाई। अदालत के निर्देश पर पुलिस ने पति के खिलाफ धारा 323, 498-ए, 504 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज किया। इसके बाद मामला अदालत में चला और दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं।
जिरह में उजागर हुआ विरोधाभास
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि महिला के आरोप और उसके लंबे समय तक पति के साथ रहने के तथ्य आपस में मेल नहीं खाते। अदालत ने अहम सवाल उठाया कि अगर शादी के तुरंत बाद से ही उत्पीड़न हो रहा था, तो 11 वर्षों तक किसी भी थाने या अदालत में शिकायत क्यों नहीं की गई। यही सवाल पूरे मामले की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।
अदालत का फैसला, फौजी पति बरी
जिला सत्र न्यायाधीश श्रीकांत पांडे ने अपने फैसले में कहा कि गंभीर और लगातार उत्पीड़न की स्थिति में इतनी लंबी देरी संदेह पैदा करती है। पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव और शिकायत में असामान्य देरी को देखते हुए अदालत ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा और फौजी पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
क्या कह रहे हैं वकील
अधिवक्ता भगवती प्रसाद पंत और महेश चंद्र सिंह परिहार के अनुसार यह फैसला इस बात की याद दिलाता है कि दहेज उत्पीड़न जैसे मामलों में समय पर शिकायत और ठोस साक्ष्य बेहद जरूरी हैं। बिना मजबूत सबूत के लगाए गए आरोप न्यायिक कसौटी पर टिक नहीं पाते।