रामनगर के घने जंगलों में बसी सीतावनी सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि त्रेता युग, माता सीता की तपोभूमि और प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य का संगम है, जो अब पर्यटन का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है।

सीतावनी
Nainital: नैनीताल जिले के रामनगर से करीब 22 किलोमीटर आगे घने जंगलों के बीच एक ऐसा पावन स्थल है, जिसे स्थानीय लोग सदियों से सीतावनी के नाम से जानते हैं। यह स्थान सिर्फ जंगल या मंदिर नहीं, बल्कि त्रेता युग से जुड़ी आस्था, इतिहास और प्रकृति का अनोखा संगम है। मान्यता है कि वनवास के दौरान माता सीता ने यहीं अपना सबसे कठिन समय बिताया और यहीं लव-कुश का जन्म हुआ।
महर्षि वाल्मीकि का आश्रम और सीता का वनवास
कहा जाता है कि सीतावनी के इन्हीं जंगलों में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था, जहां माता सीता ने शरण ली थी। हिमालयन गजेटियर से लेकर बद्रीदत्त पांडे की पुस्तक ‘कुमाऊँ का इतिहास’ तक में इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता कभी इस क्षेत्र में आए थे और जंगल की सुंदरता से प्रभावित होकर सीता जी ने वैशाख मास यहीं बिताने की इच्छा जताई थी।
झरनों और जलधाराओं से जुड़ी मान्यताएं
जिस स्थान पर माता सीता ने निवास किया, वहां से आज भी दो छोटे झरनों के निकलने की कथा प्रचलित है। स्कंद पुराण में भी सीतावनी का विस्तृत वर्णन मिलता है। कोसी नदी, जिसे पुराणों में कौशिकी कहा गया है, उसके बाईं ओर स्थित शिवगिरि पर्वत को सिद्ध संतों और गंधर्वों का निवास बताया गया है। मंदिर परिसर में बहने वाली तीन प्राकृतिक जलधाराएं मौसम के अनुसार अपना तापमान बदलती हैं, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विषय हैं।
धार्मिक आस्था से पर्यटन तक का सफर
सीतावनी में हर साल विशाल मेला और भंडारे का आयोजन होता है। यह क्षेत्र भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है और इसका प्रबंधन वन विभाग करता है। बीते कुछ वर्षों में सीतावनी पर्यटन के लिहाज से भी तेजी से लोकप्रिय हुई है। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में आने वाले पर्यटक अब जंगल सफारी और वन्यजीव दर्शन के लिए सीतावनी पहुंच रहे हैं, जहां बाघ, हाथी और गुलदार जैसे वन्यजीव देखने को मिलते हैं।
आस्था और प्रकृति का जीवंत अध्याय
बढ़ते धार्मिक उत्साह और राम मंदिर निर्माण की पावन बेला ने स्थानीय लोगों की उम्मीदों को और मजबूत किया है। सीतावनी आज सिर्फ एक जंगल नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और प्रकृति से जुड़ा वह अध्याय है, जो हर आगंतुक को त्रेता युग की स्मृतियों में ले जाता है।