यूपी चुनाव में कुर्मी-पासी बनेंगे सियासी रणनीति का केंद्र? BJP और सपा के सामने बड़ी चुनौती

यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कुर्मी और पासी समुदायों को लेकर BJP और सपा की रणनीति चर्चा में है। जानिए इन समुदायों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्यों अहम माना जा रहा है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 15 October 2026, 4:12 PM IST

लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच कुर्मी और पासी समुदायों को लेकर राजनीतिक रणनीति अहम चर्चा का विषय बन रही है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) जहां अपने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित समर्थन आधार को मजबूत बनाए रखने की कोशिश करेगी, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) इन समुदायों में अपनी पैठ बढ़ाकर चुनावी मुकाबले को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर सकती है।

राजनीतिक विश्लेषण के मुताबिक, कई विधानसभा क्षेत्रों में कुर्मी और पासी मतदाताओं की भूमिका चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, किसी भी समुदाय के मतदाताओं का रुख एक जैसा नहीं होता। उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, गठबंधन और क्षेत्रीय परिस्थितियां भी चुनावी नतीजों पर असर डालती हैं।

कुर्मी और पासी समुदाय क्यों हैं अहम?

कुर्मी समुदाय उत्तर प्रदेश के प्रमुख गैर-यादव ओबीसी समूहों में शामिल है। वहीं पासी समुदाय दलित समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। दोनों समुदायों की मौजूदगी कई क्षेत्रों में चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती है।

इसी वजह से राजनीतिक दलों के लिए इन समुदायों को प्रतिनिधित्व देना और स्थानीय स्तर पर मजबूत उम्मीदवार उतारना महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, अलग-अलग सीटों पर इनकी चुनावी भूमिका और प्रभाव में अंतर हो सकता है।

सपा की रणनीति: गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों पर फोकस

समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती अपने पारंपरिक समर्थन आधार के साथ अन्य पिछड़े वर्गों और गैर-जाटव दलित समुदायों में भी समर्थन बढ़ाने की है। पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में व्यापक सामाजिक गठजोड़ के जरिए अच्छा प्रदर्शन किया था।

आगामी विधानसभा चुनाव में कुर्मी, पासी और अन्य गैर-यादव ओबीसी समुदायों को प्रतिनिधित्व देना उसके लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प हो सकता है। पाल, गुर्जर और सैनी जैसे समुदायों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश भी इस सामाजिक समीकरण का हिस्सा बन सकती है।

हालांकि, टिकट वितरण को लेकर सपा की अंतिम रणनीति और समुदायवार उम्मीदवारों की संख्या की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।

BJP के सामने क्या होगी चुनौती?

भाजपा के लिए गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित समुदायों में अपना समर्थन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। पार्टी की चुनावी रणनीति में इन समूहों का प्रतिनिधित्व और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका अहम रह सकती है।

सपा यदि इन समुदायों के बीच अपना समर्थन बढ़ाने में सफल होती है, तो कुछ सीटों पर मुकाबला अधिक कड़ा हो सकता है। दूसरी ओर, भाजपा के लिए अपने मौजूदा सामाजिक गठजोड़ को बनाए रखना और स्थानीय असंतोष को दूर करना चुनौतीपूर्ण होगा।

पिछले चुनावों में क्या रहा कुर्मी-पासी प्रतिनिधित्व?

दिए गए चुनावी आंकड़ों के अनुसार, 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 34 कुर्मी और 15 पासी विधायक चुने गए थे, जबकि यादव समुदाय से 17 विधायक विधानसभा पहुंचे थे। 2022 के चुनाव में कुर्मी विधायकों की संख्या 40 और पासी विधायकों की संख्या 25 बताई गई, जबकि यादव समुदाय से 25 विधायक चुने गए।

ये आंकड़े विधानसभा में समुदायवार प्रतिनिधित्व की तस्वीर पेश करते हैं। हालांकि, केवल विधायकों की संख्या के आधार पर किसी समुदाय के कुल वोट, राजनीतिक पसंद या चुनावी प्रभाव का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।

टिकट बंटवारे पर टिकी रहेंगी नजरें

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के सामने सामाजिक समीकरणों को साधने और क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत उम्मीदवार चुनने की चुनौती होगी। कुर्मी और पासी समुदायों को कितना प्रतिनिधित्व मिलता है, यह उम्मीदवारों की सूची सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।

फिलहाल, इन समुदायों को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज है, लेकिन चुनावी नतीजों पर इनके प्रभाव का आकलन सीटवार परिस्थितियों और उम्मीदवारों की स्थिति को ध्यान में रखकर ही किया जा सकता है।

Location :  New Delhi

Published :  15 October 2026, 4:12 PM IST