निजी तालाब पर मनरेगा भुगतान का मामला गरमाया! बीडीओ संतोष यादव की जांच आख्या पर उठे सवाल

महराजगंज के करमहियां गांव में निजी तालाब की खोदाई के नाम पर मनरेगा भुगतान का मामला अब जांच की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रहा है। अब भुगतान के अभिलेखों की जांच, दोबारा स्थल निरीक्षण और जिम्मेदारी तय करने की मांग उठ रही है।

Post Published By: Suresh Prajapati
Updated : 17 October 2026, 2:53 PM IST

Maharajganj: मनरेगा में सरकारी धन के इस्तेमाल और कार्यों के सत्यापन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल सामने आए हैं। निचलौल ब्लॉक के करमहियां गांव में निजी तालाब की खोदाई के नाम पर भुगतान किए जाने का मामला जांच प्रक्रिया के घेरे में है।

शिकायतकर्ता राजाराम निषाद का दावा है कि पोखरी की खोदाई उन्होंने अपने निजी खर्च से जेसीबी मशीन लगवाकर कराई थी। इसके बावजूद जांच आख्या में संबंधित तालाब की खोदाई मनरेगा से कराए जाने के साक्ष्य मिलने का उल्लेख है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकारी धन किस कार्य के लिए और किन अभिलेखों के आधार पर जारी किया गया?

मामले में खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) संतोष यादव की जांच आख्या को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किसी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता अथवा अनियमितता को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता। इसकी पुष्टि विस्तृत जांच और संबंधित अभिलेखों के परीक्षण से ही हो सकेगी।

निजी खर्च से जेसीबी चलवाने का दावा, फिर मनरेगा भुगतान किस बात का?

शिकायतकर्ता राजाराम निषाद के अनुसार, उन्होंने कन्हैया यादव की जेसीबी मशीन से अपने खर्च पर पोखरी की खोदाई कराई थी। बाद में जब उन्हें तालाब के नाम पर मनरेगा के तहत धनराशि निकाले जाने की जानकारी मिली, तो उन्होंने इस संबंध में शिकायत की।

ग्रामीणों की शिकायत पर सहायक विकास अधिकारी (ग्राम्य विकास) और सहायक विकास अधिकारी (सहकारिता) ने 29 सितंबर को मामले की जांच की थी। जांच रिपोर्ट के मुताबिक, राजाराम निषाद ने अपने लिखित बयान में निजी खर्च से पोखरी की खोदाई कराने की बात कही थी। दूसरी तरफ, रिपोर्ट में जून-जुलाई 2022 के दौरान मनरेगा से तालाब की खोदाई कराए जाने के साक्ष्य मिलने का उल्लेख किया गया है।

यहीं से पूरे मामले का सबसे अहम सवाल खड़ा होता है—यदि शिकायतकर्ता के दावे के अनुसार खोदाई निजी खर्च से हुई थी, तो मनरेगा के तहत किस कार्य का भुगतान किया गया? क्या स्वीकृत कार्य और मौके पर कराए गए काम का मिलान हुआ था? मजदूरों की उपस्थिति, माप पुस्तिका और भुगतान के रिकॉर्ड क्या बताते हैं? इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।

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तालाब में पानी भरा मिला, मौके पर सत्यापन नहीं

जांच आख्या में कहा गया है कि तालाब में वर्षा का पानी भरा होने के कारण टीम मौके पर भौतिक सत्यापन नहीं कर सकी। ऐसे में जांच की पूर्णता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जब शिकायत ही तालाब की खोदाई और भुगतान को लेकर है, तो स्थल का सत्यापन नहीं हो पाने की स्थिति में वास्तविक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी? क्या पानी निकलने के बाद दोबारा निरीक्षण होगा? क्या उपलब्ध तकनीकी रिकॉर्ड और कार्य की माप का मिलान कराया जाएगा?

यह मामला केवल तालाब में पानी भरे होने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जांच में स्वीकृत कार्य, कार्यस्थल की स्थिति, मस्टर रोल, मजदूरों की उपस्थिति, माप पुस्तिका और भुगतान विवरण का मिलान महत्वपूर्ण है। यदि मौके पर तत्काल सत्यापन संभव नहीं था, तो अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर दोबारा निरीक्षण कराने से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

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प्रलोभन देकर शपथपत्र बनवाने का आरोप

मामले में शिकायतकर्ता राजाराम निषाद ने एक और गंभीर आरोप लगाया है। उनके लिखित बयान के अनुसार, ग्राम प्रधान और सचिव ने तीन हजार रुपये का प्रलोभन देकर उनसे शपथपत्र बनवाया था। उनका दावा है कि इसी शपथपत्र के आधार पर उनकी पूर्व की शिकायत बंद कर दी गई।

शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि शपथपत्र किस कार्य के संबंध में लिया जा रहा है। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में शपथपत्र की प्रति, उसकी विषयवस्तु, तैयार किए जाने की परिस्थितियों और शिकायत के निस्तारण से जुड़े रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है। संबंधित ग्राम प्रधान और सचिव का पक्ष सामने आने के बाद ही इस मामले के इस पहलू पर स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी।

उपायुक्त श्रम एवं रोजगार बोले—मामले की जांच कराई जाएगी

उपायुक्त श्रम एवं रोजगार गौरवेंद्र सिंह ने बताया कि उन्हें मामले की जानकारी है। संबंधित तालाब के नाम पर पूर्व में भुगतान होने की बात भी सामने आई है। उन्होंने प्रकरण की जांच कराने की बात कही है।

अब देखना होगा कि आगे की जांच में किन तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है। मामले की निष्पक्ष पड़ताल के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि कार्य की स्वीकृति कब दी गई, भुगतान किस मद में हुआ, कितने श्रमिकों की उपस्थिति दर्ज की गई और कार्य की माप किस आधार पर प्रमाणित हुई।

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सवालों के घेरे में भुगतान की प्रक्रिया

करमहियां गांव का यह मामला मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों के सत्यापन और सरकारी धन के भुगतान की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है। एक ओर शिकायतकर्ता निजी खर्च से जेसीबी द्वारा खोदाई कराने का दावा कर रहा है, वहीं जांच आख्या में मनरेगा से कार्य कराए जाने के साक्ष्य मिलने का उल्लेख है। इसके बावजूद पानी भरा होने के कारण मौके पर सत्यापन नहीं हो सका।

अब सबसे बड़ा सवाल है—निजी तालाब की खोदाई के नाम पर भुगतान हुआ तो किस आधार पर हुआ, और यदि जांच अधूरी रही तो मामले का अंतिम निष्कर्ष कैसे निकलेगा?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच, आवश्यक भौतिक सत्यापन और संबंधित पक्षों के बयान से ही सामने आ सकेगा। यदि किसी स्तर पर सरकारी धन के अनुचित भुगतान की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए।

Location :  Maharajganj

Published :  17 October 2026, 2:53 PM IST